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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सेठ कुन्दनलाल वकील की बात सुन भौंचक्का हो देखता रह गया। जब उसको कुछ सूझा नहीं तो उसने वकील से पूछा, ‘मान लो कि मैं उसको दस लाख रुपये की सम्पत्ति लिखकर नहीं देता, तो वह क्या कर सकता है और क्या करेगा?’’
‘‘वह आप पर दावा कर देगा कि आप उसका हिस्सा उसको दे दें।’’
‘‘उसका क्या हिस्सा है?’’
पिछले दस वर्ष में वह आपके कारोबार में भाग लेता रहा है। पिछले दस वर्ष में आपकी सम्पत्ति पचास लाख से बढ़कर डेढ़ करोड़ की हो गई है, अर्थात् आपको एक करोड़ का लाभ हुआ है। वह इसका आधा आपसे माँग लेगा।’’
‘‘मैं तो यह पूछता हूँ कि क्या वह ऐसा कर सकता है? कानून क्या कहता है?’’
‘‘आपकी सम्पत्ति में से भाग तो अवश्य उसको मिलेगा। हाँ, कितना मिलेगा, यह कहना कठिन है। यह जज के मानने की बात है।’’
‘‘तो आपकी राय है कि उसको नकद दे दूँ।’’
‘‘मेरी यही राय है। मुकद्दमेबाजी में तो खराबी होने की ही सम्भावना है।’’
सेठ कुन्दनलाल वहाँ से अपने कार्यालय में चला आया। वहाँ सुन्दरलाल एक कुर्सी पर गम्भीर विचार में बैठा हुआ था। पिता ने उसके समीप आकर बैठते हुए पूछा, ‘‘यह रोनी सूरत क्यों बनाई है?’’
‘‘इसलिए कि धन के लोभ में पिता पुत्र को दुःख देना चाहता है।’’
‘‘तुमने मुझसे माँगा है क्या?’’
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