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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

12

इतना कुछ का वचन लेकर सुन्दरलाल सूसन से मिलने गया था और वहाँ पर उसने उसको पाँच लाख नकद देने का वचन दे दिया था। इस वचन के प्रतिकार में वह सहवास की आशा करता था, परन्तु सूसन नहीं मानी। वहाँ भोजन कर वह अपने घर गया, तो उसके माता-पिता उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। सुन्दरलाल आया तो पिता ने पूछा, ‘‘बहुत देर कर दी सुन्दर !’’

‘‘जी, भोजन बाहर करना था, इस कारण देर हो गई है।’’

‘‘ठीक है। पर मैं चाहता हूँ कि आज रात ही फैसला हो जाये, नहीं तो बैंकों को मैं स्वयं जाकर, तुम्हें रुपया देने से मना कर आऊँगा।’’

‘‘यह तो आपकी इच्छा है। मैंने आपके पत्रों को एक दिन के लिए इस कारण रोक लिया है, जिससे मुकद्दमा लड़ने के लिए और मुकद्दमे का फैसला होने तक के लिए खर्चे का रुपया निकाल सकूँ। सो मैंने कर लिया है।’’

‘‘कितना रुपया निकाल लिया है?’’

‘‘बताया तो था। एक लाख मुकद्दमे के लिए और पाँच लाख अपनी नई पत्नी को देने के लिए और डेढ़ लाख एक मकान मोल लेने के लिए।’’

‘‘यह तो बहुत बड़ी चोरी कर ली है तुमने?’’

‘‘यह चोरी नहीं है पिताजी ! यह तो अपने हिस्से में से लिया है।’’

इसपर सुन्दरलाल की माता ने कहा, ‘‘मैंने सुना है कि तुम दोनों बाप-बेटा मुझको सालस मानने वाले हो?’’

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