|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘हाँ माँ ! मैं तैयार हूँ।’’
‘‘देखो सुन्दर ! सालस बनने से पहले एक बात माँ के रूप में कहती हूँ। यदि वह मान जाओ तो माँ का आशीर्वाद तुमको प्राप्त रहेगा।’’
‘‘बताओ माँ !’’
‘‘तुमने सात-आठ लाख के लगभग परिवार का रुपया, बिना परिवार के मुखिया की स्वीकृति के निकाल लिया है। यह एक अनुचित बात है। इसपर भी तुमको यह रुपया छोड़ दिया जा सकता है यदि तुम मेरी शर्त मान लो।’’
‘‘क्या शर्त है, माँ?’’
‘‘तुम उस औरत को कुछ भी लिखकर मत दो। उसको पाँच लाख रुपया नकद दे दो उसको रखैल के रूप में रहने दो। यदि उसके कोई सन्तान हो तो सन्तान होने के समय उसको उचित धन दे दिया करो। जब उससे तुम्हारा मन ऊब जाये तो फिर उसको छोड़ देना। ठीक है?’’
‘‘पर पिताजी मानेंगे यह बात?’’
‘‘तुम मानो तो उनको भी मानने के लिए कहूँ।’’
इसपर सेठ बोल उठा, ‘‘मान तो मैं भी जाऊँगा, परन्तु बैंकों को मेरा पत्र कि सुन्दरलाल मेरे कारोबार का हिसाब नहीं चलाएगा, कल चला जाना चाहिए। सुन्दर इसमें किसी प्रकार की बाधा उपस्थित न करे और न ही किसी प्रकार का मुकद्दमा चलाये।’
‘‘तो मैं स्वयं कहाँ से निर्वाह करूँगा?’’
‘‘तुम मेरे कारोबार में सहायता करोगे और तुमको माहवारी खर्च के लिए भत्ता मिलेगा।’’
‘‘पिताजी ! यही तो मैं चाहता हूँ। बैंकों को चिट्ठियाँ आप भेज सकते हैं। मुझको दो हजार रुपया मासिक मिलना चाहिए। जो कुछ मैं ले चुका हूँ, उसकी किसी प्रकार की लिखत-पढ़त नहीं दूँगा।’’
|
|||||

i 









