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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘तो फैसला हुआ। तुम अपनी ओर से पक्के रहोगे, तो तुम्हारे पिता भी अपने भाग का वचन पालन करते रहेंगे। अब तुम अपनी प्रेमिका के पास जा सकते हो। इससे अच्छा प्रबन्ध तुम्हारे लिए और नहीं हो सकता।’’

‘‘तो अब मैं जाऊँ?’’

‘‘और यहाँ क्या करने आये हो?’’

‘‘मैं तो सोने आया था। सूसन रुपये लिए बिना मुझको छूने भी नहीं देगी। रुपया तो मैं बैंक में अपने निजी हिसाब में जमा करा आया हूँ। कल ही उसको चेक काटकर दे सकूँगा।’’

‘‘अजीब पत्नी है तुम्हारी, जो तुम्हारा एक दिन का भी विश्वास नहीं कर सकती।’’

‘इस व्यंग्य से सुन्दरलाल अति लज्जित हुआ। उसने, एक भी शब्द और कहे बिना, सूसन के घर को प्रस्थान कर दिया।

इस प्रकार सुन्दरलाल सूसन के घर से जाने के एक घंटे के अन्दर ही फिर वहाँ जा पहुँचा। सूसन उसको विस्मय से देखती रह गई। उसने उसको भीतर करते हुए पूछा, ‘‘अब और क्या हो गया है, जो इतनी जल्दी वापस लौट आए हैं?’’

सुन्दरलाल बताना नहीं चाहता था कि उसकी माँ ने उसको ताना दिया है और वह उस ताने से छटपटाता हुआ वहाँ लौट आया है। इस कारण उसने बात बनाकर कह दी। उसने कहा, ‘‘डार्लिंग ! मैं घर की ओर जा रहा था कि मुझको तुम्हारी शकुन्तला से हुई बातें स्मरण आने लगीं। मुझको कुछ ऐसा सन्देह होने लगा है कि वह तुमको मुझसे दूर धकेल रही है। उसका भाग्य, आत्मा-परमात्मा और जन्म-मरण की बातें बता-बताकर, तुमको बर्गलाना, तुम्हें मुझसे छीनना ही प्रतीत होने लगा है। इस कारण मैंने यही उचित समझा कि अब मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा जिससे पीछे पछताना न पड़े।’’

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