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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘ओह ! तो अब आप यही सोना चाहते हैं?’’
‘‘बिल्कुल।’’
‘‘तो एक कठिनाई होगी। या तो आपको उस पैंटरी में सोना होगा या मुझको। जब तक एक वचन-पालन नहीं हो जाता मैं आपके साथ ही एक कमरे में सो नहीं सकती। स्मरण है कि पहले आपने विवाह करने के लिए कहा था। पीछे कहने लगे थे कि हिन्दू तरीके से विवाह होगा। फिर एक दिन आपने कह दिया कि आप कॉन्ट्रैक्ट कर देंगे और अब आप एकदम नकद रुपया देने के लिए कह गए हैं। आपका क्या भरोसा कि कल को आप यह कह दें कि रुपया लेकर क्या करना है? आपकी और आपके पिता की इतनी सम्पत्ति खड़ी है। इस प्रकार आपकी बदली जबान का भरोसा नहीं रहा।’’
‘‘तुम बताओ, भरोसा कैसे कर सकती हो? मैं कल तुमको सब रुपया दे दूँगा। यदि चाहो तो चेक अभी दे सकता हूँ।’’
‘‘पर चैक का रुपया वसूल हो जायगा क्या?’’
‘‘होगा, डियर ! हम भूखे-नंगें नहीं हैं।’’
‘‘तो लिखिए चैक।’’
सुन्दरलाल ने अपने पोर्टमैंट्यू में से एक बिलकुल नई चैकबुक निकाली और उसपर दो चैक लिख दिये–एक, एक लाख रुपये का था और दूसरा पाँच लाख का। दोनों पर हस्ताक्षर कर उसने कहा, ‘‘कल चलकर इसका रुपया बैंक से दिलवा दूँगा। इतनी बड़ी रकम के लिए परिचय माँगा जाना स्वाभाविक है। यह एक लाख तो मकान के लिए है। मकान के मूल्य में से पचास हजार पहले दे चुका हूँ। शेष यह है।’’
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