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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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शकुन्तला ने माँ को बता दिया था कि ललिता फकीरचन्द से ही विवाह करना चाहती है और उसकी माँ ने सेठ करोड़ीमल से कह दिया। सेठ का कहना था, ‘‘ललिता की आयु अभी सत्रह वर्ष की है। वह अल्पवयस्क है। उसको मेरा कहना मानना चाहिए।’’
‘‘तो मना लो। मैं पूछती हूँ कि थूककर कौन चाटता है?’’
‘‘मुझको क्या मालूम था कि फकीरचन्द चोर है। मैं चोर से अपनी लड़की का विवाह कैसे कर सकता हूँ?’’
‘‘आप ऐसा कीजिए कि फकीरचन्द को यहाँ बुला लीजिये।
मुझको तो यह सारी मोतीराम की शरारत प्रतीत होती है।’’
जहाँ एक ओर सेठ का पत्र-व्यवहार फकीरचन्द से हो रहा था, वहाँ जब्बलपुर वालों से भी बातचीत चल रही थी। एक दिन जब्बलपुर से देवकीनन्दन वहाँ आ गया। सेठ ने उसको अपने घर पर खाना दिया। सब लोग खाना खाने के कमरे में खाना लेने आये तो वहाँ एक अपरिचित युवक को देख, विस्मय में सेठजी का मुख देखने लगे। ललिता का माथा ठनका। उसको तुरन्त सन्देह हो गया कि यह युवक उसको देखने आया है। इससे वह खाने के कमरे से बाहर जाने के लिए लौट पड़ी। सेठजी न यह देखा तो कह दिया, ‘‘ललिता ठहरो। देखो, ये हैं देवकीनन्दन जी। ये जब्बलपुर से आए हैं। इनके पिता मेरे मित्र हैं।’’
ललिता ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया। इसपर देवकीनन्दन ने कहा, ‘‘मैं तो आपके यहाँ भोजन करने आया हूँ, और आप जा रही है। यह तो शिष्टाचार के विपरीत होगा।’’
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