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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
ललिता शिष्टाचार की चुनौती सुन लौट पड़ी और शकुन्तला के पास आकर बैठ गई। शकुन्तला और उसकी माँ ने उसके मुख की दृढ़ मुद्रा देख समझ लिया कि वह कुछ विशेष बात करने जा रही है। इससे दोनों डर रही थीँ। भोजन आया और खाया गया। सेठजी ने कोई बात नहीं की। इससे समय निकल गया और कोई अनिश्चित घटना नहीं घटी।
भोजन के पश्चात् सेठ देवकीनन्दन को लेकर बाहर बैठक में चला गया और शकुन्तला, ललिता तथा उसकी माँ पिछले कमरे में चली गईं। तीनों चुप थीं और डर रही थीं कि झगड़ा होने वाला है।
इनको कुछ अधिक काल तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी। पन्द्रह मिनट के भीतर ही सेठ रामचन्द्र के साथ वहाँ आया और पन्नादेवी को बधाई देने लगा। सेठ ने कहा, ‘‘लो राम की माँ ! बधाई हो। लड़के ने ललिता को पसन्द कर लिया है। रुपये-पैसे की बात भी हो गई है। उसने कहा है कि जैसा शकुन्तला के विवाह के समय हुआ था, वैसा ही वह मान जायेगा। अब तुम बताओ कि विवाह कब का निश्चित किया जाये?’’
पूर्व इसके कि ललिता की माँ कुछ कहे ललिता बोल उठी। उसने कहा, ‘‘मुझे वह पसन्द नही, इसलिए मैं उससे विवाह नहीं करूँगी।’’
‘‘विवाह तुम्हें करना है?’’ रामचन्द्र ने माथे पर त्योरी चढ़ाकर कहा।
‘‘मेरा नहीं तो तुम्हारा होगा?’’ ललिता का सतर्क उत्तर था। इसपर सब हँसने लगे। पन्नादेवी ने बात टालने के लिए कह दिया, ‘‘ललिता को मना कीजिये। मान जाये तो विवाह की तिथि निश्चित हो जायगी।’’
‘‘इसको मानना ही पड़ेगा।’’ रामचन्द्र ने फिर कहा।
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