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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘तुम्हारी ओर बिहारी भैया !’’
‘‘कुछ खास बात है क्या?’’
‘‘हाँ, है तो।’’
‘‘तो फिर वापस कमरे में चलें?’’
‘‘नहीं कहाँ जा रहे हैं आप?’’
इसपर सूसन ने कह दिया, ‘‘मैं इनको चाय पर निमन्त्रण देने आई थी और हम चाय पीने जा रहे हैं। यदि आपको मेरे विवाह की चाय पीने में आपत्ति न हो तो मैं आपको भी आमन्त्रित करती हूँ।’’
‘‘आपका विवाह? कब हुआ?’’
‘‘हमारा विवाह तो ऐसा नहीं है कि एक रिचुअल (वेद-मन्त्र) बोल दी गई और हो गये पति-पत्नी। हमारा विवाह तो एक धीरे-धीरे परिपक्व होने वाली प्रक्रिया थी। इसका आरम्भ हुआ था पिताजी के अंगूरों के उद्यान में और अन्त हुआ है मैरीन ड्राइव वाले मकान में।’’
‘‘और इतनी देर तक आप आँख-मिचौनी खेलते रहे हैं?’’
शकुन्तला ने मुस्कराते हुए पूछा।
सूसन हँस पड़ी। हँसकर उसने कहा, ‘‘आओ शकुन्तला ! तुमसे बहुत बातें करनी हैं।’’
‘‘वहाँ आपके पति भी होंगे क्या?’’
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