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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘नहीं, वे मेरे परिचितों को मुझ पर छोड़ चुके हैं और अपने परिचितों को दावत दे चुके हैं। बम्बई में मेरे परिचितों में बिहारी भैया और आप बहिनें ही तो हैं।’’

‘‘पर आप तो स्वयं ही चाय पीने जा रहे थे। मैं यहाँ आ गई, तो हम बहिनों की बात होने लगी है।’’

‘‘जी नहीं; बिहारी भैया से पूछिये कि हम कहाँ जा रहे थे?’’

बिहारीलाल ने स्पष्टीकरण कर दिया, ‘‘शकुन्तला बहिन ! ये मेरे कमरे में आईं तो कहने लगीं कि आपको और ललिता को घर चलकर बुलाया जाये। मैं आपके घर जाना नहीं चाहता था। इसपर यह निश्चय हुआ था कि हम टैक्सी में जायेंगे और आपके पिताजी के घर से कुछ इधर ही उसको खड़ा कर देंगे। ये आपको मिलने जायेंगी और आपको निमन्त्रण देकर साथ ले आयेंगी। मुझे विश्वास नहीं आता था कि आप इस दावत पर आयेंगी। इसपर भी यह यत्न करना चाहती थीं। हम अभी टैक्सी की प्रतीक्षा में खड़े थे कि आप इधर आती दिखाई दी।’’

सूसन ने कहा, ‘‘इसपर भी ललिता को लेने तो चलना ही होगा।’’

‘‘वह नहीं आयेंगी। उसने आज से अनशन आरम्भ कर दिया है।’’

‘‘वह क्या होता है?’’ सूसन ने पूछा।

‘‘वह अपने पिताजी से रूठकर खाना-पीना छोड़ बैठी है।’’’

‘‘क्या लाभ होगा इससे?’’

‘‘जब भूखे रहकर वह मरने लगेगी तो पिताजी उसकी बात मान जायेंगे।’’

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