लोगों की राय

उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

Like this Hindi book 8 पाठकों को प्रिय

270 पाठक हैं

बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘बात मनाने का यह कोई अच्छा उपाय तो नहीं है?’’

‘‘अच्छा उपाय हो अथवा बुरा। अब तो वह इसका प्रयोग कर रही है। देखें, क्या परिणाम निकलता है।’’

‘‘कब से खाना-पीना छोड़ा है?’’

‘‘आज मध्याह्न का भोजन तो किया है। अब आगे न खाने का व्रत ले लिया है।’’

सूसन ने कहा, ‘‘वह आकर मुझको बधाई तो दे ही सकती है।’’

‘‘वह आयेगी अथवा नहीं, मैं नहीं जानती।’’

‘‘चलो चलें। ललिता भी एक ‘इण्टरेस्टिंग क्रीचर’ है।’’ सूसन ने कहा।’’

वहाँ से वे शकुन्तला के पिता के घर को चल पड़े। गाड़ी मकान से कुछ दूर ही खड़ी कर दी गई। बिहारीलाल उसमें बैठा रहा। शकुन्तला और सूसन दोनों ललिता को बुलाने चल पड़ी। बिहारीलाल मन में विचार कर रहा था–कैसी विडम्बना है यह ! शकुन्तला की सौतन शकुन्तला को अपने विवाह का निमन्त्रण दे रही है और शकुन्तला मान गई है। वह विचार करता था कि कहीं सेठजी को पता चल गया कि यह गोरी लड़की कौन है, तो वे शकुन्तला को उसके साथ देखकर जलभुन जायेंगे। वे इस घटना में उत्पन्न मन की भावना को समझ ही नहीं सकेंगे। वह समझता था कि कदाचित् सूसन डाँट खाकर अकेली ही घर से बाहर आयेगी। उसके विस्मय का ठिकाना नहीं रहा जब सूसन अपनी दोनों बाँहें शकुन्तला और ललिता की बाँहों में डाले हुए आती दिखाई दी। वह गाड़ी से उतर आया और ललिता का स्वागत करने के लिए आगे बढ़कर हाथ जोड़ नमस्कार करने लगा।

...Prev | Next...

<< पिछला पृष्ठ प्रथम पृष्ठ अगला पृष्ठ >>

अन्य पुस्तकें

लोगों की राय

No reviews for this book