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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


ललिता ने समीप पहुँच कह दिया, ‘‘मैं खाऊँगी तो कुछ नहीं। इसपर भी सूसन बहिन को बधाई देने चली आई हूँ। साथ ही आपका बाहर खड़ा होना सुन, मैंने समझा कि स्वयं ही अपने विषय में बातचीत कर लूँ।’’

चारों टैक्सी में बैठ गये और ताज होटल पहुँच, वहाँ के रिसैप्शन हॉल के एक कोने में जा बैठे। सूसन ने अपनी पार्टी के लिए सीटें रिजर्व कराई हुई थी। बिहारीलाल ने दावत की तैयारी देखी, पूछ लिया, ‘‘सूसन बहिन ! यदि मैं और ये दोनों न आते, तो फिर इस दावत का क्या होता?’’

‘‘मेरा मन कहता था कि आप अस्वीकार नहीं करेगें। यही तो बात है कि मैं आपसे मिलने के पश्चात् और किसी से मित्रता नहीं कर सकी। मिस्टर भगेरिया अपने कई मित्रों से मिला चुके हैं, परन्तु मुझे वे नितान्त फूहड़ प्रतीत होने लगे हैं। जितनी सहृदयता और ईमानदारी मैंने आप लोगों में देखी है, वह उन मित्रों में नहीं मिली।

‘‘विवाह के बाद इस सप्ताह वे अनेक मित्रों को दावतें दे चुके हैं। मैंने आज आपको और शकुन्तला बहिन को दावत देने की बात कहीं, तो वे हँस पड़े। उनका विचार था कि मैं स्वप्न-लोक में विचरती हूँ और आप लोग मुझको बधाई देने नहीं आयेंगे। इस कारण जब मैं आपको यहाँ बैठे देखती हूँ, तो मेरा मन गर्व से भर जाता है कि मेरे मित्र उनके मित्रों से बहुत ही ऊँची श्रेणी के व्यक्ति हैं।’’

दावत हुई और वहाँ से वे हैंगिग गार्डन में चले गये। एक बैंच पर बैठकर शकुन्तला ने ललिता की बात चला दी। शकुन्तला ने जब्बलपुर वाले लड़के का आना और फिर उससे विवाह की बात का वृत्तान्त सुना दिया। तप्पश्चात् उसने ललिता का निश्चय भी बताया। बिहारीलाल इस बात को सुन आश्चर्य कर रहा था कि क्या बात है, जिससे यह लड़की उसके भाई के लिए अपने परिवार वालों से झगड़ा करने के लिए उद्यत हो रही है। वह नहीं जानता था कि उसके भाई के मन में इस विषय में क्या प्रतिक्रिया होगी। शकुन्तला ने अपनी बात बताकर बिहारीलाल से पूछा, ‘‘आपको भाई साहब का कोई पत्र आया है?’’

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