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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘आया है। इस बार पत्र दो सप्ताह के बाद। उन्होंने लिखा है कि एक अत्यावश्यक काम में लगे होने के कारण वे पत्र नहीं लिख सके वैसे यहाँ पर सब ठीक-ठाक है। उन्होंने यह नहीं लिखा कि क्या काम था, जिसमें वे लगे हुए थे।’’

‘‘तो आप लिखकर पता क्यों नहीं करते?’’

‘‘ललिता भाभी लिखने को कहें तो लिख सकता हूँ। इनकी ही ओर से लिखूँगा।’’

‘‘किस प्रकार लिखोगे?’’

‘‘लिखूँगा कि ललिता भाभी आज मिली है। उनको सेठजी ने बताया है कि सेठजी के फार्म से कुछ रुपया चला गया है और वह रुपया आपसे ले लिया है। भाभी को इस बात का विश्वास नहीं आता। इसपर भी अवस्था यह हो गई है कि उनसे आपकी सगाई टूटी मान ली गई है और भाभी की नयी सगाई करने का विचार हो रहा है। भाभी इससे बहुत चिन्तित हैं। वह इस नये प्रबन्ध को पसन्द नहीं करतीं इसी कारण रुपये की बात की वास्तविकता जानना चाहती है।

‘‘इसके पश्चात् अपनी ओर से लिखूँगा कि मुझको इस बात को सुनकर दुःख हुआ है। क्या हुआ है भैया? मैं समझता हूँ कि आपको पूर्ण बात लिखनी चाहिए थी।’’

‘‘ठीक है, लिख दो और जो उत्तर आये, वह हमें बताना।’’

‘‘मैं यही विचार कर रहा हूँ कि यदि वास्तविक बात का पता चल जाये, तो सेठजी को समझाया जा सकता है।’’

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