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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

14

ललिता ने खाना-पीना छोड़ दिया। प्यास लगने पर वह थोड़ा नींबू वाला पानी ले लेती थी। इसके अतिरिक्त वह कुछ भी नहीं ले रही थी। पहिले दो दिन तक तो वह एक से दूसरे कमरे में डोलती रही, परन्तु तीसरे दिन शकुन्तला के कमरे में पलँग पर लेट गई।

पहिले दिन तो सेठ और रामचन्द्र ने इसको हँसी-मजाक में उड़ा दिया। उनका कहना था कि भूख लगेगी तो खा लेगी। तीसरे दिन जब वह पलँग पर लेट गई, तो रामचन्द्र ने कह दिया, ‘ऐसा कोई नहीं कर सकता। अवश्य माँ उसको चोरी-चोरी खाना खिलाती है।’’

‘‘राम ! तुम क्या सबको अपने जैसा ही बेईमान समझते हो? ललिता को भूखा रखने में मुझको क्या मिलेगा?’’ माँ से पूछा।

‘‘पिताजी ललिता का विवाह फकीरचन्द से कर देंगे।’’

‘‘तो मुझे क्या मिलेगा? एक बहिन को अमीरों के घर में देकर मजा ले लिया है न? अब दूसरी को भी दे दो। मुझे क्या कहते हो?’’

‘‘तुम्हारा मतलब है कि सब अमीर एक जैसे ही हैं?’’

‘‘नहीं बेटा ! अमीर तो एक जैसे नहीं, पर सब गरीब एक जैसे ही होते हैं?’’

रामचन्द्र माँ के इस कथन का अर्थ समझ नहीं पाया। वह माँ का मुख देखता रह गया। उसे चुप देख माँ ने कहा, ‘‘ललिता भूख-हड़ताल पर है। तुम उसे खिला-पिला दो, कौन मना करता है?’’

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