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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘मैं खिलाता हूँ।’’ इसके पश्चात् उसने पिता की ओर देखकर कहा, ‘‘पिताजी ! आइये, देखूँ कैसे नहीं मानती !’’ इतना कह वह शकुन्तला के कमरे में चला गया। ललिता दीवार की ओर मुख किये लेटी हुई थी। रामचन्द्र ने कहा, ‘‘ललिता ! उठो, खाना खाओ।’’
ललिता ने उसकी ओर मुख करके कहा, ‘मुझे भूख नहीं है।’’
‘‘तो क्या चोरी-चोरी खाओगी?’’
‘‘हाँ, जब तुम जान गये हो तो मेरे मरने की चिन्ता रही नहीं। जब लेटे-लेटे थक जाऊँगी, अपने आप उठकर खाने चल पड़ूँगी।’’
‘‘पिताजी !’’ रामचन्द्र ने पिता को सम्बोधन कर कहा, ‘‘लातों के भूत बातों से नहीं मानते। उठाइये इसको। एक बाँह आप पकड़िये और दूसरी मैं पकड़ता हूँ।’’
इतना कह उसने ललिता की बाँह पकड़कर झटका दे उठाया। पिता ने भी पुत्र की बात का समर्थन करने के लिए दूसरी बाँह पकड़कर उसको उठा दिया। दोनों ने उसको घसीटकर नीचे उतार लिया। ललिता भूमि पर लेट गई। पिता-पुत्र उसको घसीटने लगे। इस खींचातानी में ललिता अचेत हो गई। माँ ने जब ललिता की आँखें चढ़ती देखीं, तो कड़ककर बोली, ‘‘देखो-देखो, लड़की मर रही है।’’
सेठ मरने की बात सुन डर गया और उसने ललिता की बाँह छोड़ दी। रामचन्द्र भी उसको देखने लगा। ललिता का, अचेत होने से सिर लुढ़क गया था। यह देख रामचन्द्र भी डर गया।
पन्नादेवी ने राम को डाँटकर कहा, ‘‘जाओ, टेलीफोन से डॉक्टर को बुलाओ। जल्दी करो।’’ इसपर सेठ ने कह दिया, ‘‘नहीं, पहले इसको उठाकर कमरे में ले चलो।’’
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