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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
शकुन्तला और पन्नादेवी ने ललिता को उठा लिया और पलँग पर लिटा दिया। पन्नादेवी ने नौकरानी को पानी लाने को कहा। शकुन्तला ने अलमारी मे से ‘स्मेलिंग साल्ट’ निकालकर सुँघाना आरम्भ कर दिया।
बहुत ही कठिनाई से ललिता को चेतना हुई। चेतना लौटने पर उसने कहा, ‘‘माँ ! तुम जाओ खाना खाओ। मुझे अपने भाग्य पर छोड़ दो।’’
उस रात किसी ने भी भोजन नहीं किया, परन्तु किसी को कुछ उपाय भी सूझ नहीं पड़ा। अगले दिन शकुन्तला और पन्नादेवी ललिता को समझा रही थीं कि इस समय नौकरानी ने आकर कहा, ‘‘बाहर कोई गोरी औरत खड़ी है और शकुन्तला बहिन से मिलना चाहती है।’’
शकुन्तला समझ गई कि कौन है। माँ ने प्रश्न-भरी दृष्टि में शकुन्तला की ओर देखा, तो उसने कह दिया, ‘‘ललिता की सहेली है।’’
‘‘तो जाओ, बुला लाओ। कदाचित् उसके समझाने से यह समझ जाये।’’
शकुन्तला ने नौकरानी को कहा, ‘‘उसको भीतर ले आओ।’’
सूसन आई तो ललिता को पीत मुख पलँग पर लेटे देखकर कुछ समझ, कहने लगी, ‘‘तो आरम्भ कर दिया है व्रत?’’
‘‘यह तो उसी दिन आरम्भ कर किया था, जिस दिन आपके विवाह की दावत हुई थी।’’
‘‘ओह ! इसको तो अब चौथा दिन हो गया है। तब से कुछ नहीं खाया?’’
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