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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
पन्नादेवी हँस पड़ी और उसने ललिता के द्वारा कहलाया कि वे तो अंग्रेजी समझते नहीं और ये हिन्दुस्तानी बोल नहीं सकती।
इसपर ललिता ने कह दिया, ‘‘पर माँ ! मास्टरानी लज्जावन्ती आई हुई है। तुमको बीच बैठाकर बात हो सकती है।’’
‘‘पूछती हूँ तुम्हारे पिताजी से।’’
पन्नादेवी कमरे के बाहर चली गई। इस समय सूसन ने पूछा, ‘‘आपसे बिहारीलाल मिला है अथवा नहीं।’’
‘‘वह यहाँ आ नहीं सकता और हममें से कोई बाहर जा नहीं सका।’’
‘‘वह मुझे कल मिला था। उसने बताया है कि उसके भाई का पत्र आया है। उसके भाई ने लिखा है कि रुपये के विषय में पूर्ण दोष सेठजी का है। पुलिस जाँच का परिणाम दो-चार दिन में मजिस्ट्रेट के सामने उपस्थित होगा और फिर नकल लेकर उसके पास भेज देगा।’’
‘‘हमारी समझ में नहीं आ रहा कि पिताजी ने क्या खराबी की होगी। कुछ भी हो, मेरा आग्रह उनसे विवाह का तो है नहीं। मेरा कहना है कि मेरा विवाह मेरे वयस्क होने तक न किया जाये।’’
इस समय सेठ करोड़ीमल और पन्नादेवी तथा साथ में सफेद वायल की साड़ी और जम्पर पहने एक स्त्री आ गई। सूसन ललिता के पलँग पर बैठी थी। सकुन्तला सामने एक कुरसी पर बैठी थी। सेठजी के आने पर सूसन और शकुन्तला उठ खड़ी हुईं। सेठ ने उनको बैठे रहने को कहा और स्वयं एक कुरसी पर बैठ गया। लज्जावन्ती, ललिता की शिक्षिका, एक अन्य कुरसी पर बैठ गई। पन्नादेवी भी ललिता के पलँग के दूसरी ओर बैठ गई। सेठ ने आते ही शिक्षिका को कहा, ‘‘इससे पूछो कि यह कौन है?’’
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