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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मेरा नाम सूसन है। मैं यूरोप की रहने वाली हूँ। ललिता मेरी सहेली है। इसके लिए एक निवेदन करना चाहती हूँ।’’

सेठजी ने उसके कहने का आशय सुन फिर पूछा, ‘‘आप कौन है? आपके पति क्या करते हैं? कब और कहाँ ललिता से आपकी मैत्री हुई थी?’’

‘‘इन बातों को तो पीछे बता सकूँगी। अभी तो ललिता की जान खतरे में पड़ी है। उसके विषय में ही बात करना चाहती हूँ।’’

‘‘मैं आपसे अपने घर की प्राइवेट बात तब तक नहीं कर सकता, जब तक आपके विषय में पूर्ण परिचय न पा लूँ।’’

‘‘मैं ललिता की वकील हूँ। इस नाते ही आपसे बात करना चाहती हूँ।’’

‘‘आप हमारे मकान से निकल जाइये। आप यहाँ आई क्यों है?’’

सूसन अभी विचार ही कर रही थी कि इसका क्या उत्तर दे कि शकुन्तला बोल पड़ी। उसने कहा, ‘‘पिताजी ! सूसन बहन को मैंने बुलाया है। यह मेरी भी सहेली हैं। यह तो केवल यह कहना चाहती है कि यदि आप इसका विवाह चार वर्ष के लिए रोक दें, जब तक यह वयस्क न हो जाये, तो यह अभी भोजन कर लेगी।’’

‘‘देखो शकुन्तला ! मैं विवाह रोकूँगा अथवा नहीं, यह इस गोरी लड़की के कहने से नहीं होगा। ललिता मेरी लड़की है और मेरा अधिकार है कि मैं इसका जहाँ चाहूँ, वहाँ विवाह करूँ। मेरे इस अधिकार में यह कौन है हस्तक्षेप करने वाली?’’

‘‘अच्छी बात है। मैं इसको कह देती हूँ कि यह हमारे काम में हस्तक्षेप न करे।’’

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