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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘हाँ, मैं फकीरचन्द को अमानत में खयानत करने के लिए कैद कराना चाहता हूँ और यह उससे शादी करना चाहती है। इसको शर्म आनी चाहिए।’’
इतना कह सेठ करोड़ीमल वहाँ से उठकर ‘बाहर चला गया। शिक्षित चली गई तो पन्नादेवी ने सूसन की ओर देखकर कहा, ‘‘देखा है न, कैसे आदमी से हमारा वास्ता पड़ा है। अभी यहाँ आने से पहले मुझसे कह रहे थे कि वह विवाह रोक रहे हैं, परन्तु तुमको यहाँ बैठे देखकर उबल पड़े हैं।’’
‘‘तो ऐसे आदमी को सीधा करना बहुत आवश्यक है। यह तो लड़की को मार डालेगा।’’
‘‘कैसे सीधा कर सकते हैं? हमको तो कोई रास्ता सूझता नहीं।’’
‘‘एक रास्ता मैं बताऊँ?’’
‘‘जैसे सेठजी को बताया है?’’
‘‘पर माताजी ! क्या आप भी वैसी हठी हैं?’’
शकुन्तला ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘तो वह भी बता दीजिये।’’
‘‘आप दोनों भी भूख-हड़ताल कर दीजिये।’’
‘‘क्या?’’ पन्नादेवी ने विस्मय में सूसन का मुख देखते हुए कहा।
‘‘मेरा कहने का अर्थ यह है कि शकुन्तला बहन और ललिता की माता भी व्रत रखेंगी तो सेठजी को ललिता की माँग का अर्थ जल्दी समझ आयेगा।’’
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