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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘अपनी बहिन के प्रति सहानुभूति में। वह कहती है कि उसकी बहिन की बात ठीक है और आपको मान जाना चाहिए।’’

‘‘तो मुझको उसकी बात मानने पर विवश करने के लिए वह भी भूख-हड़ताल कर रही है ! वह गोरी औरत कह गई है कि कल आयेगी और यदि तब तक मैं विवाह स्थगित न कर सका, तो वह पुलिस में इस भूख-हड़ताल की रिपोर्ट लिखा देगी। इससे भारी बदनामी होगी।’’

‘‘तो आपने उसको क्या कहा है?’’

‘‘मैं इन छोकरियों की बातों से डरता नहीं। जब पुलिस आयेगी, तो मैं कुछ ले-देकर मुआमला रफा-दफा करा दूँगा।’’

पन्नादेवी सेठजी के इस प्रकार अपनी बात चलाने के स्वभाव को जानती थी। इससे वह समझ गई कि सूसन के करने से कुछ नहीं होगा

खाना परस दिया गया। सेठजी और रामचन्द्र खाने लगे, परन्तु पन्नादेवी मुँह में डाला ग्रास निगल नहीं सकी। उसको कुछ ऐसा अनुभव हुआ कि रोटी मुख में फूलती ही जाती है और गले में जाकर अटक रही है। उसने एक घूँट पानी पीकर ग्रास निगल जाने का यत्न किया; परन्तु जब वह उसको निगल नहीं सकी, तो उसने उठकर मुख का ग्रास शैंक में डाल दिया। सेठ ने यह देख पूछा, ‘‘क्या है?’’

‘‘खाया नहीं जाता।’’

‘‘क्यों?’’

‘‘आप नहीं जानते क्यों? लड़कियों ने खाना छोड़ दिया है और मैं खाना खाऊँ?’’

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