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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘मत खाओ। तुम भी खाना छोड़ दो।’’
‘‘ठीक है। मैं अभी तक आपके स्वभाव को जानती हुई भी समझती थी कि मेरे लिए मन में कोमलता विद्यमान है। मेरा ऐसा समझना गलत था।’’ इतना कह वह भोजन की मेज से उठकर अपने कमरे में चली गई और चादर ओढ़ लेट रही।
सेठ ने एक-दो ग्रास और खाये, परन्तु इस परिस्थिति में कुछ भी खा सकना असम्भव मान, उठकर हाथ धोने लगा।
इसपर रामचन्द्र ने कह दिया, ‘‘आखिर औरतों की जीत हुई न पिताजी?’’
सेठ करोड़ीमल ने इसका कुछ भी उत्तर नहीं दिया।
सेठ अपने कार्यालय में चला गया। वहाँ देवगढ़ से दो पत्र आये रखे थे–एक मोतीराम का था और दूसरा फकीरचन्द का। मोतीराम के पत्र में केवल इतना लिखा था कि लक्ष्मीधर पकड़ा गया है और सब-कुछ बक गया है। उसके वारण्ट निकल चुके हैं।
इस पत्र को पढ़कर सेठ करोड़ीमल के मस्तक पर चिन्ता की रेखाएँ दिखाई देने लगीं। फकीरचन्द ने अपने पत्र में लिखा था–
‘‘आपका पत्र दिनांक ३० अप्रैल १९३५ का मिला है और उसके उत्तर में निवेदन है कि आपका यह आरोप कि मेरी असावधानी के कारण अथवा मेरी सहायता से मोतीराम रुपया ले भागा है, सत्य नहीं है। मैं आपका नौकर न कभी था और न हूँ।
‘‘मैंने कभी भी मोतीराम की सच्चरित्रता का उत्तरदायित्व नहीं लिया। मैं तो केवल हिसाब-किताब रखने के लिए था। जब मुझे हिसाब-किताब में गड़बड़ का सन्देह हुआ, मैंने जाँच आरम्भ कर दी और आपको भी लिख दिया।
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