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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘मैं मोतीराम को पकड़वाने का यत्न कर रहा हूँ। आशा है कि वह शीघ्र ही पुलिस के हाथ आ जायेगा।

‘‘आपके पत्र में यह बात पढ़कर मुझको विस्मय हुआ है कि यदि मुझको ललिता से सगाई स्थिर रखनी है, तो मैं आपको यह पाँच हजार रुपया दे दूँ, चाहे अपने पास से दूँ और चाहे चोर से प्राप्त करके दूँ।

‘‘मैं आपको आपका पाँच हजार रुपया दे दूँगा, परन्तु यह इसलिए नहीं कि मुझको आपकी लड़की से विवाह करना है, प्रत्युत इसलिए कि कहीं इस पाँच हजार के न मिलने से आपका दिवाला न निकल जाये।

‘‘जहाँ तक सगाई का सम्बन्ध है, वह तो अब रह नहीं सकती। आप जैसे स्वार्थी, धुर्त्त और मुर्ख धनी के साथ अपना सम्बन्ध बनाऊँ और आपका रक्त अपनी होने वाली सन्तान की नसों में प्रवाहित होने दूँ, यह अपनी सन्तान के साथ घोर अन्याय हो जायेगा।

‘‘रुपया शीघ्र ही मिल जायेगा। आशा है कि इस आश्वासन से आपको नींद आने लगेगी।’’

वास्तव में यही सेठ चाहता था, परन्तु पहले पत्र की उपस्थिति में, वह अपने में कुछ भी उल्लास अनुभव नहीं कर सका। इसपर भी इस पत्र से उसने यह लाभ उठाने का यत्न किया कि किसी भाँति ललिता को दिखाकर, उसको फकीरचन्द के विपरीत कर सके। इस कारण उसने पन्नादेवी को कहा, ‘‘देखो रानी ! फकीरचन्द का पत्र आया है और उसने जो प्रेम प्रकट किया है, वह ललिता को पढ़ा दो। कदाचित् उसको अब भी समझ आ जाये।’’

पन्नादेवी ने पत्र लिया और उसको लेकर ललिता के कमरे में चली गई। वहाँ शकुन्तला भी अब लेट गई थी। सेठानी ने पत्र ललिता के हाथ में देकर कहा, ‘‘सेठजी कहते हैं कि इसको पढ़ लो।’’

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