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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
चतुर्थ परिच्छेद
1
फकीरचन्द की सगाई के पश्चात् करोड़ीमल तो चला गया, परन्तु उस दिन से फकीरचन्द और मोतीराम में झगड़ा होने लगा। मोतीराम फकीरचन्द की बात तो मान जाता था, परन्तु उसकी शिकायत सेठजी को लिख देता था। जब लकड़ी बिकने लगी तो सेठजी ने एक अपना आदमी इस काम के लिए वहाँ भेज दिया। इसका नाम लक्ष्मीधर था। यह लकड़ी बेचने का काम करने लगा था। लक्ष्मीघर सेठजी का अपना आदमी है, यह समझ फकीरचन्द ने कुछ पूछ-गीछ की आवश्यकता नहीं समझी।
इस प्रकार काम चलते हुए एक वर्ष से ऊपर हो गया। फकीरचन्द का विचार था कि खेती-बाड़ी के लिए पर्याप्त भूमि खाली हो गई है और उसमें काम आरम्भ कर दिया जाये; परन्तु मोतीराम इसमें बाधा खड़ी करता रहा।
एक दिन फकीरचन्द ने लकड़ी के निकास और मजदूरी का अनुमान लगाया तो उसको कुछ ऐसा लगा कि काम ठीक नहीं हो रहा। जितना खर्च हो रहा था, उसके अनुपात से लकड़ी नहीं निकल रही थी। फकीरचन्द ने इसका उल्लेख मोतीराम से किया तो उसने यह कहकर बात टाल दी कि जंगल घटिया है और उसमें पेड़ छोटे-छोटे हैं।
अगले दिन फकीरचन्द ने चौधरी रामहरष को बुलाकर कहा कि वह तनिक देखे कि सेठ के जंगल से लकड़ी कम क्यों निकल रही है। एक वर्ष में पचास एकड़ से अधिक भूमि खाली हो चुकी है।
इसपर फकीरचन्द ने मन-ही-मन हिसाब लगाकर देखो तो उसका कुछ गड़बड़ प्रतीत हुई। अगले दिन उसने शेषराम को बुलाया और उसको जिरौन स्टेशन पर पता करने भेजा कि पिछले मास में कितने वैगन लकड़ी के गये हैं।
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