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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


जिस समय शेषराम इस विषय की सूचना एकत्रित रहा था, लक्ष्मीधर वहाँ आ पहुँचा। जब उसको शेषराम की पूछ-गीछ के विषय का पता चला तो उसने उसको एक ओर बुलाकर पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’

‘‘मैं शेषराम हूँ, मोतीराम का भाई ।’’

‘‘तो तुमको मोतीराम ने भेजा है?’’

शेषराम चुप रहा। वह नहीं चाहता था कि फकीरचन्द का नाम ले। इसपर लक्ष्मीधर ने कहा, ‘‘देखो, फकीरचन्द से कोई बात कहने से पहले मोतीराम को कहना कि मुझसे बातचीत कर ले।’’

शेषराम स्टेशन मास्टर से यह पता कर लाया कि एक मास में बीस वैगन लकड़ी के बुक किए गए हैं। फकीरचन्द ने देखो कि उसको केवल ग्यारह वैगन का हिसाब लिखाया गया है। उसने इस विषय में और जाँच करने के लिए स्वयं स्टेशन पर जाकर पिछले छः मास का हिसाब जानने का यत्न किया। उसको पता चला कि जबसे लक्ष्मीधर काम करने लगा है, कभी भी भेजे गये माल का पूरा हिसाब उसको नहीं मिला। घर पर आकर उसने आँकड़े मिलाए, तो उसने देखा कि लगभग पाँच हजार रुपये का गबन हुआ है।

इसपर उसने मोतीराम को बुला भेजा, परन्तु वह गाँव में नहीं मिला। पता चला कि वह झाँसी गया हुआ है। फकीरचन्द ने उसके हिसाब-किताब की जाँच-पड़ताल की तो और भी त्रुटियाँ निकलीं। जंगल में तीन काम करने वालों के नाम झूठ-मूठ लिखे हुए थे। वास्तव में उन नामों के व्यक्ति गाँव में थे ही नहीं।

लक्ष्मीधर से जब इस विषय में पूछा गया तो उसने पूरे माल की रसीदें मोतीराम के हाथ की दिखा दीं।

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