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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
मोतीराम की तीन-चार दिन तक प्रतीक्षा की गई और जब वह नहीं लौटा, तो इस गबन की पुलिस में रिपोर्ट लिखकर, उसको लापता घोषित कर दिया गया। यह सूचना सेठ को भी दी गई।
इस सूचना पर सेठजी और फकीरचन्द में कई चिट्ठियों का आवागमन हुआ। पहले तो फकीरचन्द पर असावधानी का आरोप लगाया गया। पीछे सेठजी ने फकीरचन्द को चोरी कराने में सहायक मान लिया। पश्चात् सेठ ने अपने अन्तिम पत्र में लिखा कि वह फकीरचन्द से ‘बहुत निराश हुआ है और वह अपनी लड़की का सम्बन्ध उससे तोड़ता है। यदि फकीरचन्द अभी भी चाहता है कि उसकी सगाई ललिता से स्थिर रहे, तो वह पाँच हजार रुपया अपने पास से दे दे। इसके उत्तर में फकीरचन्द ने वह पत्र लिखा था, जो सेठ ने ललिता को पढ़ने के लिए दिया था। सेठजी का, इस पत्र को ललिता को दिखाने का प्रयोजन तो यह था कि वह फकीरचन्द से घृणा करने लगे और अपनी भूख-हड़ताल तोड़ दे; परन्तु उनका प्रभाव विलक्षण ही हुआ। वह अपने मन में यह विचार कर बैठी कि सत्य ही उसका पिता महास्वार्थी है और ऐसे आदमी का रक्त, उसकी भी नसों में प्रवाहित हो रहा है। इससे छुट्टी पाने के उपाय उसको वही सूझा, जो किसी गन्दे कपड़े से छुटकारा पाने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। जैसे कपड़े को उतार फेंक दिया जाता है, वैसे ही उसने इस शरीर को त्याग देने का निर्णय कर लिया। वह अब तक नींबू और पानी ले रही थी। इस दिन से यह भी लेना उसने बन्द कर दिया। परिणामस्वरूप दुर्बलता तीव्रता से बढ़ने लगी।
बिहारीलाल ने ललिता की भूख-पड़ताल की सूचना अपने भाई को भेज दी। इस सूचना के उत्तर में यह पत्र आया, बिहारी ! ऐसा प्रतीत होता है कि बम्बई में तुम अपना बहुत-सा समय व्यर्थ के कामों में व्यय कर रहे हो। तुम्हारी परीक्षा समीप आ रही है। इस कारण ललिता का विचार छोड़कर अपना ध्यान पढ़ाई में लगाओ। उससे मैं निपट लूँगा। तुमको उससे मेल-जोल बन्द कर देना चाहिए।’
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