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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल को अपने भाई की यह बात कि ललिता से वह स्वयं निपट लेगा, सन्तोष देने वाली सिद्ध हुई। इससे उसने ललिता का विचार अपने मन से निकालकर, अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान लगा दिया। उसकी वार्षिक परीक्षा में एक मास से भी कम समय रह गया था।

इसपर भी ललिता इत्यादि से तटस्थ नहीं रह सका। लगभग एक सप्ताह के पश्चात् सूसन उसको मिली। वह कॉलेज से होस्टल की ओर लौट रहा था। सूसन बहुत घबराई हुई प्रतीत हो रही थी। बिहारीलाल ने उसकी ओर प्रश्न-भरी दृष्टि से देखा तो सूसन ने बता दिया, ‘‘बिहारी ! ललिता की हालत बहुत खराब हो रही है। तुम्हीं चलकर उसको बचा सकते हो।’’

‘‘क्यों? क्या हुआ है?’’

‘‘कई दिन से उसने पानी लेना भी बन्द कर दिया था। इससे हालत बहुत खराब हो गई है। मैं कई दिन से उसको समझा रही थी कि यह तो आत्म-हत्या के तुल्य हो जायेगा। परन्तु उसका कहना है कि अब जीने में कुछ सार ही प्रतीत नहीं होता। मुझे मालूम हुआ है कि आपके भाई की कोई चिट्ठी सेठजी के पास आई है और सेठजी ने वह चिट्ठी ललिता को दिखा दी है। उस चिट्ठी में कुछ ऐसा लिखा था, जिससे वह जीवन से निराश हो गई है।

‘‘मैंने उसको बहुत यत्न से इस बात के लिए मनाया है कि यदि तुम उसेआश्वासन दो कि तुम उसकी अपने भाई से सुलह करा दोगे, तो वह व्रत तोड़ देगी। सेठ इतनी बात के लिए तैयार है कि वह ललिता के वयस्क होने तक उसका कहीं पर भी विवाह नहीं करेगा।’’

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