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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘देखो सूसन बहिन ! सेठजी ने भैया से बहुत बुरा व्यवहार किया प्रतीत होता है। इससे ही क्रोध में आकर उन्होंने कदाचित् सख्त बात लिख दी है। जबतक पूर्ण परिस्थिति का ज्ञान न हो, मैं इस विषय में हस्तक्षेप करना नहीं चाहता।’’
‘‘बहुत विचित्र आदमी हो तुम ! तनिक-सा कष्ट करने से एक नहीं तीन प्राणियों की जान बचती है और तुम वह भी नहीं करना चाहते?’’
‘‘तीन कौन?’’
‘‘ओह ! तो तुमको यह पता नहीं है कि ललिता से सहानुभूति में शकुन्तला और उसकी माँ ने भी माँ ने अनशन कर दिया है। माँ की हालत तो बहुत ही खराब हो रही है। शकुन्तला कुछ ठीक है।’’
यह सुन तो बिहारीलाल के मन में इस सब झमेले के विषय में और अधिक जानने को लालसा जाग पड़ी। वह चलने के लिए तैयार हो गया। फिर कुछ विचारकर बोला, ‘परन्तु सेठजी तो मेरा वहाँ जाना पसन्द नहीं करेंगे।’’
‘‘मैं सेठजी से पूछकर आई हूँ। जब उनको विश्वास हुआ कि तुम्हारे समझाने से ललिता खाने को तैयार हो सकती है, तो वे मान गये हैं।’’
बिहारीलाल सूसन के साथ टैक्सी में सवार होकर सेठ करोड़ीमल के घर जा पहुँचा। मकान के बाहर जब वे टैक्सी से उतर ही रहे थे, रामचन्द्र बहुत घबराया हुआ भीतर से निकला और इनको टैक्सी में से निकलते देख, पूछने लगा, ‘‘क्या मैं आपकी टैक्सी ले जा सकता हूँ?’’
‘‘क्या हुआ है? कहाँ जा रहे हो?’’ बिहारीलाल ने पूछा।
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