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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘डॉक्टर को बुलाने। माँ अचेत हो गई है। सचेत करने का बहुत यत्न किया है, परन्तु सफलता नहीं मिल रही।’’

‘‘टेलीफोन क्यों नहीं कर दिया?’’

‘‘एकाएक बिगड़ गया है।’’ इतना कह वह लपककर टैक्सी में सवार हो गया और टैक्सी ले गया।

सूसन और बिहारीलाल पहले माँ को ही देखने गये। सेठ वहाँ उपस्थित था। उसने बिहारीलाल को देखने कहा, ‘‘तुम लोगों ने मेरा सर्वनाश कर दिया है। देखा न, क्या हो रहा है?’’ यह कह उसने अपनी पत्नी की ओर संकेत कर दिया। वह सर्वथा अचेत थी।

सूसन ने उसको सचेत करने का यत्न किया, परन्तु कुछ लाभ नहीं हुआ। इसपर सूसन ने कहा, ‘‘हम ललिता बहिन से मिलना चाहते हैं।’’

‘‘जाओ, उसको भी देखो। वह भी मरणासन्न पड़ी है।’’

सूसन और बिहारीलाल ललिता के कमरे में चले गये। वहाँ शकुन्तला भी लेटी हुई थी। उसने ललिता के पास जाकर कहा, ‘‘भाभी ! यह क्या कर लिया है?’’

ललिता ने कुछ कहना चाहा, परन्तु गला सूखा होने के कारण आवाज नहीं निकल सकी। इसपर बिहारीलाल ने अपना कान, उसके समीप ले जाकर सुनने का यत्न किया। ललिता कह रही थी, ‘‘मैं समझती हूँ कि अब जीने में कोई सार नहीं रहा। मैं इतना कुछ होने के पश्चात आपके भाई को अपना मुख नहीं दिखा सकती।’’

‘‘क्यों? क्या हुआ है?’’

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