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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘पर वे तो कहते हैं कि पिताजी के रक्त में ही दोष है और उनका रक्त ही मेरी नसों में प्रवाहित हो रहा है। इससे तो यह आवश्यक हो गया है कि इस रक्त का शोधन किया जाये। यह शोधन सिवाय नया शरीर धारण करने के और किसी उपाय से नहीं हो सकता।’’
‘‘नहीं भाभी। इसके अतिरिक्त भी उपाय है। देखो, मैं वचन देता हूँ कि मैं अपनी माँ को अपने घर ले जाकर बिठाऊँगा, नहीं तो मैं उस घर का मुख नहीं देखूँगा।’’
ललिता अभी भी दुविधा में पड़ी थी। इसपर सूसन, एक गिलास में संतरा निचोड़ और उसमें थोड़ा नमर डालकर ले आई। उसने ललिता को, जो अति दुर्बल हो गई थी, हाथ का आश्रम देकर उठाया और गिलास उसके मुख से लगा दिया। ललिता अभी भी अनिश्चित मन थी। इसपर बिहारीलाल ने ललिता के पाँव को हाथ लगाकर कहा, ‘‘भाभी ! अब छोड़ों हठ को। मेरा कहा मानो ओर विश्वास रखो कि हमको अपने काम में सफलता मिलेगी।’’
ललिता ने एक घूँट संतरे का रस लिया। पश्चात् ग्लूकोज घोल, शर्बत बनाकर उसके दो-तीन घूँट पिलाये गये।
जब ललिता यह ले रही थी, सेठजी उस कमरे में आए और बोले, ‘‘बिहारीलाल ! क्या बात है अब? शकुन्तला की माँ को तो ग्लूकोज सल्यूशन रक्त में चढ़ाई गई है।’’
‘‘इन्होंने तो संतरे का रस ऐसे ही लेना स्वीकार किया है। यह आपके वचन पर विश्वास करती हैं कि आप इनकी इच्छा के बिना इनका विवाह नहीं करेंगे।’’
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