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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


सेठ ने इसका उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप फिर बाहर चला गया। उसे जाते देख सूसन ने कहा, ‘‘शकुन्तला के पिता को तो अपनी पत्नी की अधिक चिन्ता है। मैं सत्य कहती हूँ कि यदि इनकी माँ व्रत न रखतीं, तो ये कभी इस बात के लिए तैयार नहीं होते कि ललिता को अपने विवाह में राय देने का भी अधिकार हो।’’

इसके पश्चात् शकुन्तला ने भी संतरे का रस लिया। सूसन ने कहा, ‘‘अब तो डॉक्टर की राय के बिना खाना-पीना नहीं होना चाहिए। मैं डॉक्टर को बुलाकर लाती हूँ।’’

सूसन कमरे में बाहर गई तो लज्जावंती, ललिता की अध्यापिका वहाँ आ गई। जबसे शकुन्तला और पन्नादेवी ने व्रत रखा था, तबसे सेठजी के कहने से, वह इनके घर पर ही ठहरी हुई थी। घर पर और कोई औरत नहीं थी, जो इनकी सेवा-सुश्रुषा कर सकती। बाहर से सम्बन्धियों को सेठ साहब भूख-हड़ताल की बात बताना नहीं चाहते थे। इस कारण उसके भाई की पत्नी अथवा अन्य मित्रों की स्त्रियाँ आ नहीं रही थीं।

लज्जावंती पन्नादेवी के कमरे में सेठजी के कहने पर इधर आई थी। उसने शकुन्तला को बताया, ‘‘डॉक्टर साहब का कहना था कि सेठानीजी के कई दिन से जल न लेने के कारण, उनका रक्त गाढ़ा हो गया था। अब उन्होंने एक पौंड से ऊपर से ऊपर ग्लूकोज सल्यूशन उनके रक्त में चढ़ाई है और उनको चेतना हुई है। डॉक्टर का कहना है कि सेठानी जी को संतरे का रस पीना चाहिए, पर सेठानीजी नहीं ले रहीं। उनका कहना है कि जबतक ललिता नहीं खायेगी, वे कुछ भी खाने-पीने को नहीं लेंगी।’’

शकुन्तला ने कहा, ‘‘लज्जावंती बहिन ! अब तुम जाकर कह दो कि बिहारी भैया के कहने से ललिता ने और मैंने भी भोजन लेना आरम्भ कर दिया है। अब उनको भी ले लेना चाहिए।’’

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