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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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बिहारीलाल सूसन की सेठजी की लड़कियों को बचाने में रुचि देखकर विस्मय कर रहा था। वह सुन्दरलाल की परित्यक्ता पत्नी थी। इस अवस्था में दोनों सौतनों का परस्पर कैसे प्रेम हो सकता है, वह समझ नहीं सकता था। यद्यपि वह सूसन के, बिना विवाह के सुन्दरलाल की पत्नी बनने को पसन्द नहीं करता था, परन्तु सूसन के इस नये रूप को देख वह उसके लिए प्रशंसा से भर रहा था।
लगभग दो घण्टों के यत्न से, सबको खिला-पिला और शेष बात डॉक्टर के हाथ में छोड़, वे दोनों वहाँ से चल पड़े। पहली टैक्सी जो रामचन्द्र ले गया था, छोड़ दी गई थी। अतः वे दोनों मकान के बाहर टैक्सी की प्रतीक्षा में खड़े हो गये।
इस समय बिहारीलाल ने अपने मन की बात जानने के लिए पूछा, ‘‘सूसन बहिन ! इस सबसे मुझको तो कदाचित् ललिता जैसी भाभी मिलेगी परन्तु तुमको क्या मिला है?’’
‘‘मुझको एक अच्छा काम करने का संतोष प्राप्त हुआ है।’’
‘‘पर मैं पूछता हूँ कि इनकी जान बचाना कुछ अच्छा काम है क्या?’’
‘‘इनकी और उनकी का तो प्रश्न ही नहीं। किसी भी मनुष्य की जान बचाना मानवता है। मैं भी तो मनुष्य हूँ। इसलिए मुझको आज के काम से बहुत संतोष अनुभव हो रहा है।’’
बिहारीलाल ने दूर से एक टैक्सी आती देखी तो हाथ उठाकर उसको रोका। टैक्सी आकर खड़ी हुई और वे उसमें चढ़ने लगे, तो बिहारीलाल की दृष्टि एक आदमी पर जा पड़ी। यह आदमी सेठजी के मकान में दाखिल हो रहा था। बिहारीलाल ने उसकी पीठ ही देखी थी, इसपर भी उसने पहिचान लिया। यह मोतीराम था।
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