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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
इतना कह वह टैक्सी वाले को भाड़ा देकर उतर आई और सुन्दरलाल के पास जा बैठी। जब मोटर चल पड़ी तो सुन्दरलाल ने कहा, ‘‘तुम पूछ रही थीं कि मैं क्या कर रहा था यहाँ? मैं तुमपर निगहवानी कर रहा था।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘इसलिए कि तुम जैसी सुन्दर स्त्री पर कोई भी बलात्कार कर सकता है। यह हिन्दुस्तान है और उसमें भी बम्बई।’’
‘‘आपका चिन्ता करना व्यर्थ है। पैरिस विषय-वासना में लिप्त नगर में, जब मेरा कोई कुछ बिगाड़ नहीं सका, तो यहाँ तो मुझको कुछ चिन्ता ही नहीं।’’
‘‘पर मुझको तो है, विशेष रूप से इस बिहारीलाल से। देखो सूसन ! मैंने तुमको पहले भी मना किया था कि इस छोकरे से कुछ अधिक सम्पर्क रखना ठीक नहीं; परन्तु तुम तो मेरी बात मानती ही नहीं।’’
‘‘मैंने आपकी बात का अक्षरशः पालन किया था। परन्तु आज एक ऐसा काम आ पड़ा था कि बिहारीलाल से मिलना और उसको एक स्थान पर ले जाना अत्यावश्यक हो गया था।’’
‘‘क्या मैं उस काम को जान सकता हूँ?’’
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