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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘क्यों नहीं? शकुन्तला की बहिन ललिता को तो आप जानते ही हैं। उसके पिता ने उसका विवाह एक अन्य स्थान पर करना चाहा था। उसकी सगाई, यह भी आपको विदित है, बिहारीलाल के भाई से टूट गई थी। इसपर ललिता ने आमरण खाना-पीना छोड़ने का आयोजन कर लिया। उससे सहानुभूति में शकुन्तला और उनकी माँ ने भी भूख हड़ताल कर दी। इस समय एक और घटना घटी। बिहारीलाल के भाई का एक पत्र सेठजी को आया, जिसमें उसने अपनी सगाई ललिता से टूट गई स्वीकार की और यह लिख दिया कि सेठ जैसे निकृष्ट व्यक्ति की लड़की से वह विवाह कर ही नहीं सकता। सेठ ने यह पत्र अपनी लड़की ललिता को दिखा दिया। इससे ललिता ने यह मान कि अब उसका विवाह देवगढ़ में हो नहीं सकेगा, मरने का निश्चय कर लिया और पानी तक भी पीना बन्द कर दिया। उसकी माँ और बहिन भी कुछ ले नहीं थीं। इस कारण तीन प्राणियों की जान बचाने का प्रश्न उपस्थित हो गया। मैंने सेठजी को यह सुझाव दिया कि बिहारीलाल यदि यह आश्वासन ललिता को दे कि वह अपने भाई को समझा सकेगा, तो ललिता अवश्य भोजन ले लेगी। इस कारण बिहारीलाल को वहाँ लेकर गई थी और ललिता को समझा-बुझाकर सन्तरे का रस पिला आई हूँ। उसकी बहिन और माँ ने भी रस लेना आरम्भ कर दिया है।’’
सुन्दरलाल सूसन की कथा सुनकर हँसने लगा। सूसन ने समझा कि उसको इस कथा पर विश्वास नहीं आया। इससे उसने पूछा, ‘‘तो आप समझते हैं कि मैं झूठ कह रही हूँ?’’
‘‘नहीं डार्लिंग। मैं यह विचार कर हँसा था कि सेठ को यह देख कि उसकी लड़की की सौतन अपनी सौतन की जान बचाने में साधन बन रही है, खूब आनन्द आया होगा।’’
‘‘जी नहीं । वे यह नहीं जानते कि मेरा आपसे क्या सम्बन्ध है। वे तो मुझको ललिता की सहेली-मात्र ही मानते हैं। उनको मैंने यह बताया है कि ललिता की मुझसे मित्रता हैंगिग गार्डन्ज़ में हुई थी।’’
‘‘तो तुम झूठ भी बोला करती हो?’’
‘‘यह इसलिए कि वे इतने उदार तो हो नहीं सकते, जितनी उनकी लड़कियाँ है। इस कारण उनको मेरी वास्तविकता जानकर दुःख होता।’’
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