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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘परन्तु यदि तुम उनसे बहुत मिलती-जुलती रही, तो एक दिन यह भेद खुलकर ही रहेगा।’’

‘‘तो खुल जाये। मुझको इसकी चिन्ता नहीं।’’

‘‘पर यह तुम्हारा बिहारीलाल से सम्पर्क मुझको भाता नहीं।’’

‘‘आपने पहले भी कहा था और मैंने आपका भ्रम निवारण करने का यत्न किया था। मालूम नहीं कि आप दूसरों पर इतना अविश्वास क्यों करते हो।’’

‘‘मैंने एक अंग्रेज कवि की यह उक्ति पढ़ी है, ‘विमेन ! दाई नेम इज़ फ्रेल्टी’ (औरत दुर्बलता का दूसरा नाम है )।’’

‘‘मैं भी, इस उक्ति को सत्य समझती थी; परन्तु यहाँ आकर मुझको उस कवि की इस धारणा पर सन्देह होने लगा है।’’

‘‘क्यों सन्देह हो गया है?’’

‘‘यहाँ लाखों की संख्या में विधवाएँ हैं, जो दीन-हीन होती हुईं भी आत्मा से दुर्बल नहीं है। वे अपना जीवन बिना दूसरे विवाह का चिन्तन किए व्यतीत कर रही हैं। देखिये, आपने जो नौकरानी रखी है, बाल-विधवा है। इसपर भी वह इन बातों के विषय में कभी ध्यान नहीं करती। मैंने उसको कहा था कि वह विवाह कर ले, इसपर उसने कहा था, ‘कुछ आवश्यकता अनुभव नहीं होती।’’

‘‘शकुन्तला की बात भी मुझको बहुत ही विचित्र प्रतीत हुई है। वह आपसे प्रेम नहीं करती, इसपर भी उसको नया विवाह करने की कुछ इच्छा प्रतीत नहीं होती।’’

‘‘इसको मैं मन की दृढ़ता नहीं करता, प्रत्युत विवशता मानता हूँ। कृत्रिम परिस्थिति के कारण ये अविवाहित रहने पर विवश हो रही हैं।’’

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