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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘इसपर वे पूछने लगे कि क्या एक-दो वर्ष में किसी लड़की को अपने भले-बुरे का ज्ञान हो जाता है?

‘‘मैंने उत्तर दिया कि ज्ञान तो उसकी अभी भी है। यह तो केवल विधान ने पुरुषों के अनधिकार चेष्टा की सीमा बाँधी है।’’

‘‘वे नाक चढ़ाकर बोल उठे, ‘औरत कभी भी सज्ञान नहीं होती। उसको सदा पुरुष के नियन्त्रण में रहना चाहिए।’ वे बोले, ‘औरत एक दुर्बल जीव है। भगवान् ने उसको पुरुष के अधीन रहने के लिए ही बनाया है।’’

‘‘अब बताइये आपने अंग्रेजी के एक कवि के शब्द कह दिये और उन्होंने अपने पचास वर्ष के अनुभव की बात कर दी। मुझको, जो अपने आस-पास अनेक औरतों को देखती हूँ, यह बात निराधार प्रतीत होती है। मैंने बिहारीलाल और शकुन्तला से इस विषय में बात की है। उनका कहना है कि किसी के मन के विचार, उसके अपने संस्कारों और कर्मों का प्रतिबिम्ब होते हैं।

‘‘इसका अर्थ हुआ कि हम पुरुष दुर्बलात्मा हैं और हमको औरतें ही दुर्बल दिखाई देती है।’’ इतना कह सुन्दरलाल हँसने लगा।

इस समय मोटर उनके मकान के नीचे पहुँची थी। इन्होंने मोटर एक और खड़ी की और नीचे उतर मकान पर चढ़ने लगे। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए सुन्दरलाल ने कहा, ‘‘चाहे कुछ भी हो; तुम चाहे बहुत ही सुदृढ़ मन रखती हो, तो भी मैं चाहता हूँ कि बिहारीलाल से सम्पर्क न रखो।’’

‘‘वैसे तो मैंने उस दिन भी आपको वचन दिया था कि उसको ढूँढ़ने नहीं जाऊँगी, परन्तु यदि वह मिल गया तो मैं उससे भाग नहीं सकती।’’

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