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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


इस समय सेठ करोड़ीमल वहाँ आ पहुँचा। उसने सूसन को जाने के लिए तैयार देख कह दिया, ‘‘ठहरो ! इस मूर्ख लड़के की बात पर नाराज होने की आवश्यकता नहीं। बैठो।’’

सूसन बैठी नहीं। सेठ ने कहा, ‘‘मैं यह तो समझ गया था कि तुम्हारा इन लड़कियों से विशेष सम्बन्ध है। मेरा विचार था कि तुम बिहारीलाल की मिस्ट्रेस हो। इस बात का सन्देह करते हुए भी मैंने तुमको यहाँ आने से रोका नहीं था। अब वह आदमी बिहारीलाल नहीं सुन्दरलाल है, इससे क्या अन्तर पड़ता है?

‘‘रही यह बात कि सुन्दरलाल कभी शकुन्तला का विवाहित पति था, इस विषय में विचार करना मेरा काम नहीं, शकुन्तला का है। जब उसने तुमको अपनी सखी स्वीकार किया है, तो मैं कौन हूँ इसमें मना करने वाला? मैं इस कारण आया हूँ कि उस मूर्ख लड़के की बात का विचार छोड़कर, तुम चाहो तो यहाँ आ-जा सकती हो।’’

‘‘धन्यवाद, सेठजी।’’ इतना कह सूसन कमरे से बाहर निकल गई। जब वह चली गई तो करोड़ीमल ने रामचन्द्र को, जो भीगी बिल्ली की भाँति पिता के पीछे खड़ा था कहा, ‘‘देखो बेटा ! मैंने तुमको कई बार कहा है कि तुम अपने स्वभाव को सुधारो, नहीं तो व्यापार में सफल नहीं हो सकते। भला कोई किसी की रखैल है अथवा किसी की बहन, हमें इससे क्या? वह इस घर में आती है, तुमसे मिलने तो आती नहीं। जिससे मिलने आती है, पहले उससे तो पूछ लो कि वह उसके आने को पसन्द करती है अथवा नहीं।’

‘‘पिताजी !’’ शकुन्तला ने कहा, ‘‘वह अब यहाँ नहीं आयेगी और यदि राम का ऐसा ही व्यवहार रहा, तो मुझको अपने रहने के लिए पृथक् प्रबन्ध करना पड़ेगा।’’

‘‘अभी तो कोई आवश्यकता नहीं। हाँ, कभी आवश्यकता हुई तो मैं तुम्हारे रहने का प्रबन्ध कर दूँगा।’’

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