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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
जब सूसन गई थी, तो दिन के दस बजे थे। उसका स्वभाव था कि ‘ब्रेकफास्ट’ लेकर वह दोनों बहिनों के स्वास्थ्य का समाचार लेने आया करती थी।
जब वह चली गई और सेठ भी उसको अपने मन की बात बता कर चला गया, तो शकुन्तला ने मन में निश्चय कर लिया कि वह आज ही उससे मिलने जायेगी। शकुन्तला और ललिता को व्रत तोड़े आज पन्द्रह दिन हो चुके थे और वे अपने में काफी शक्ति अनुभव करने लगी थीं। इस कारण ललिता ने कह दिया, ‘‘मैं भी साथ चलूँगी।’’
‘‘तो ऐसा करेंगे कि बारह बजे के लगभग मैं उसको टेलीफोन करूँगी और समय निश्चित कर लूँगी।’’
बारह बजे शकुन्तला ने अपने पिता के कार्यालय से ही टेलीफोन किया। इस समय तक सूसन अपने घर पहुँच चुकी थी। उसने कहा, ‘‘शकुन्तला बहिन ! मुझको राम के डाँटने से क्रोध नहीं आया, प्रत्युत खेद और विस्मय हुआ था। खेद इस बात पर कि इस देश में धनवान होने से कोई सभ्य नहीं होता। मैं अपनी माँ के साथ इंग्लैंड में रही हूँ। वहाँ ‘ऐरिस्टोकेसी’ के अर्थ सभ्य के माने जाते हैं। मन में चाहे मतभेद हो, परन्तु उस मतभेद को प्रकट करने का सभ्य समाज में एक ढँग होता है और उसका मैंने भारत के दो-चार आदमियों में, जिनसे मेरा अभी तक सम्पर्क रहा है, अभाव पाया है। मुझे विस्मय हुआ है, आपमें और राम के व्यवहार में अन्तर देखकर। जितनी आप और ललिता सभ्य और सुशील हैं, उतना ही वह उद्दण्ड प्रतीत हुआ है।
‘‘खैर, छोड़ो इस बात को। मैं तो आज आपको यह बताने के लिए आपके घर आई थी कि कल मेरी भेंट अपने श्वसुर से हुई थी और उनके साथ जो मनोरंजक बात हुई है, वह आपके विषय में भी थी। आप आना चाहें, तो सायंकाल उसी रैस्टोराँ में, जो मैरीनड्राइव पर है, साढ़े चार बजे आ जाइयेगा।’’
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