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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।

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सूसन सुन्दरलाल भगेरिया के साथ मैट्रोपोलिन सिनेमा हॉल में एक पिक्चर देखने जा रही थी कि सुन्दरलाल को वैस्टर्न चैम्बर ऑफ कॉमर्स से टेलीफोन आया। सट्टा मार्केट में कुछ गड़बड़ हो रही थी। जबसे उसके पिता ने उसको अपने बैंक अकाऊण्ट ऑपरेट करने लगा था। उसने जमानत का अपना पृथक् रुपया जमा करा रखा था। उसके पिता ने चैम्बर के सैकेटरी से कह दिया था कि सुन्दरलाल की जमानत का रुपया उसकी जमानत में समझा जा सकता है। सुन्दरलाल का पिता अपनी जमानत की सीमा के अधिक सोना खरीद रहा था। उससे जब और जमानत माँगी गई तो उसने चिट्ठी लिखकर दे दी कि सुन्दरलाल का बीस हजार रुपया उसकी जमानत में सम्मिलित कर लिया जाये। इसपर चैम्बर के सैकेटरी ने सुन्दरलाल से इस बात का समर्थन माँगा। सुन्दरलाल ने स्वयं चैम्बर में उपस्थित होकर बात करने को कह दिया। इस कारण उसका, सिनेमा जाने के स्थान चैम्बर जाना अधिक आवश्यकता हो गया इसपर भी सूसन को निराश न करने के लिए उसने कह दिया, ‘‘सूसन डार्लिंग ! सीटें रिजर्व हैं। सो तुम चलो और चलकर जगह पर बैठो, मैं आ रहा हूँ।’’

सुन्दरलाल ने एक टिकट सूसन को दे दिया और दूसरा अपनी जेब में रखा, टैक्सी में चैम्बर की ओर चला गया। सूसन सिनेमा हॉल में जा पहुँची। जब वह अपनी सीट पर जाने लगी तो उसने देखा कि उसके साथ की सीट पर एक प्रौढ़ावस्था की स्त्री तथा उससे पहले की सीट पर, उसी अवस्था का एक पुरुष बैठा है। सूसन अपनी सीट तक पहुँचने के लिए उनके आगे से गुजरने लगी तो उस औरत ने अपने पाँव को एकाएक आगे कर दिया, जिससे सूसन का पाँव उसके पाँव पर पड़ गया और उस औरत के मुख में आ-आ की आवाज निकल गई। सूसन को अपनी गलती अनुभव हो गई। वह क्षमा माँगने ही वाली थी कि साथ में बैठे पुरुष ने डाँटकर कहा, ‘‘बहुत बदतमीज़ हो।’’

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