|
उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
|
270 पाठक हैं |
बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सूसन हिन्दूस्तानी समझने तो लगी थी, परन्तु वह अभी इस प्रकार के फारसी के कठोर शब्दों का अर्थ नहीं समझती थी। वह यह तो समझ गई थी कि उसकी निन्दा की गई है। इस कारण उसने क्षमा माँग ही ली। इसपर उस औरत ने कहा, ‘‘क्षमा की बच्ची ! पाँव का भुर्था कर दिया है।’’
‘‘अँधेरे में दिखाई नहीं दिया, माँजी ! लाइये पाँव दबा दूँ।’’
‘‘तुम अंग्रेज मालूम होती हो?’’
‘‘जी।’’
‘‘पर हिन्दुस्तानी बोलती हो।’’ वह औरत अपना पाँव कुर्सी पर रखकर एक हाथ से दबा रही थी। सूसन ने उसका पाँव दबाने के लिए हाथ बढ़ाया, तो उस औरत ने कहा, ‘‘रहने दो बेटी !’’
‘‘पर माँजी ! जब कोई आगे से गुजर रहा हो, तब पाँव ऊपर को समेटकर बैठना चाहिए।’’
‘‘तुम ठीक कहती हो, परन्तु पैर दब जाने से जब दर्द होता है तो ठीक और गलत में भेद-भाव प्रतीत नहीं होता।’’
सूसन मुस्कराई और उस औरत की इस मनोवैज्ञानिक बात को सुन कहने लगी, ‘‘पर कई लोग तो दर्द हट जाने पर भी अपनी भूल मानने को तैयार नहीं होते। आपने तो बहुत जल्दी ही भूल स्वीकार कर ली है।’’
उस प्रौढ़ा ने मुस्कराकर और बात बदलकर पूछा, ‘‘तुम्हारा घरवाला कहाँ नौकर है?’’
|
|||||

i 









