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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


इस प्रश्न से सूसन विचार में पड़ गई कि वह अपना परिचय दे अथवा नहीं। विचारोपरान्त उसने यही निश्चय किया कि गोल अनिश्चत उत्तर ही देना चाहिए। उसने कहा, ‘‘एक फर्म में नौकर हैं।’’

पूर्व इसके कि वह औरत और प्रश्न पूछे, सूसन ने पूछना आरम्भ कर दिया। उसने पूछा, ‘‘ये आपके पति है?’’

‘‘हाँ; ये कभी सिनेमा देखने नहीं आते थे, परन्तु अब कुछ महीनों से इनको ये बहुत पसन्द आने लगे हैं।’’

‘‘तो आपको पसन्द नहीं है?’’

‘‘जो कुछ यहाँ नकल में होता है, वह दुनिया में असल में भी तो होता है। नकल देखने से असल देखना ही अच्छा है।’’

‘‘पर असल सबको देखना नसीब नहीं है न !’’

‘‘आखें खोलकर चलें तो अपने-आप दिखाई देने लगता है। देखो, हमारा एक लड़का फ्रांस सैर करने गया था और वहाँ से एक लड़की को भगा लाया है। अब हजारों रुपये उसपर खर्च कर रहा है।’’

‘‘बहुत खराब आदमी है !’’ सूसन ने हँसकर कहा। एकाएक उसकी हँसी बन्द हो गई। उसको सन्देह हो गया कि कहीं ये उसके सास-श्वसुर न हों। इससे उसको अपने कहे पर खेद होने लगा। उसने गम्भीर होकर कहा, ‘‘मैं समझती हूँ कि आपका लड़का उससे बहुत प्रेम करता होगा। तभी तो उसपर बहुत रुपया खर्च कर रहा है।’’

‘‘इसको प्रेम नहीं कहते। हम इसको जादू कहते हैं। उस औरत ने लड़के पर जादू कर दिया मालूम होता है। उसके लिए लड़का बाप से भी लड़ने को तैयार हो गया था। मैंने बहुत यत्न से बाप-बेटे को समझाया, तो अब काम चलाने लगा है।’’

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