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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सूसन को अपने अनुमान का एक और प्रमाण मिल गया। अब उसको लगभग विश्वास हो गया था कि ये उसके सास-श्वसुर ही हो सकते हैं। इसपर भी वह निश्चय करना चाहती थी। इस कारण उसने उस औरत से सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा, ‘‘इससे तो यह सिद्ध हुआ है कि माँ का जादू अधिक प्रबल रहा है। क्या अब उसने उस औरत को छोड़ दिया है?’’
‘‘मैंने उस औरत को छोड़ने को नहीं कहा। मैंने तो यह कहा था कि जबतक बाप जीवित है, तबतक लड़का अपना पृथक् काम कर ले। अपनी कमाई में से जिसको जितना चाहे दे; परन्तु पिता की कमाई में से कुछ व्यय न करे।’’
‘‘यह तो कुछ भी न हुआ। क्या आप बहुत धनी हैं?’’
‘‘बहुत न सही, पर कुछ तो हैं।’’
‘‘क्या मैं आपके लड़के का नाम जान सकती हूँ? मुझको आप की कहानी में रुचि उत्पन्न हो रही है।’’
‘‘यही तो मैं कह रही थी कि कभी नकल से असल अधिक रुचिकर हो सकता है।’’
‘‘जी हाँ, इसमें रुचिकर बात यह है कि उस आदमी ने अपनी प्रेमिका के लिए, पिता की सम्पत्ति से पृथक् होना स्वीकार कर लिया है। क्या नाम है उनका?’’
‘‘उनका नाम है सुन्दरलाल भगेरिया। क्या आपका बहुत से हिन्दुस्तानियों से परिचय है?’’
‘‘मैं समझती हूँ कि मैं आपके लड़के को जानती हूँ।’’
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