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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘कितना रुपया दे दिया है?’’

‘‘जितना इसने मेरी ईमानदारी का मूल्य समझा। इसने जो माँगा, वह मैंने दे दिया है।’’

‘‘यह ठीक है। तुमने बहुत अच्छा किया है, परन्तु इसने तुम्हारी ईमानदारी का मूल्य लगाकर, अपनी कीमत कम कर दी है। इसने तुम्हारी कीमत उतनी ही लगाई है, जितनी एक वेश्या किसी भी पुरुष की लगा सकती है। अपने पति का मूल्यांकन धन से करनेवाली स्त्री बहुत ही संकुचित मनोवृत्ति की कहलायेगी।’’

इसपर सूसन ने पूछ लिया, ‘‘यदि मैं किसी धर्म की विधि से विवाह कर लेती और रुपया-पैसा न लेती, तो अधिक अच्छा था न।’’

‘‘हाँ, उस समय तुम एक मानव का मूल्य मानव के सिक्को में लगातीं। अब तुमने मानव को रुपयों से तौलने का यत्न किया है।’’

‘‘तो आपका विचार है कि शकुन्तला बहिन ने बहुत अच्छा किया था और वह मुझसे बहुत अच्छी औरत है?’’

इस प्रकार शकुन्तला का नाम सुनकर सेठ कुन्दनलाल चुप कर गया। वह नहीं जानता था कि यह उस विषय में कितनी बात जानती है। उसको चुप देख सूसन ने आगे पूछा, ‘‘आपका मूल्य उसने उचित से कुछ अधिक नहीं लगाया क्या?’’

‘‘क्या मतलब !’’ सुन्दरलाल के पिता ने पूछा।

‘‘मतलब तो साफ है। मानव का मूल्य मानव की भाँति लगाने वाली को जो मिला है, भली-भाँति जानती हूँ। मैंने इनका मूल्य एक वेश्या की भाँति लगाया है और आप देख रहे हैं कि मुझको क्या मिल रहा है। मैं समझती हूँ कि मेरा व्यवहार उचित ही है।’’

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