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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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‘सेसिल’ में भोजन करते हुए सेठ कुन्दनलाल ने कहा, ‘‘तुमने इस औरत को पत्नी माना है, इस कारण मैं इसको दावत देने के लिए तैयार हो गया हूँ। इसपर भी मैं ऐसी औरत को अपने घर में घुसने नहीं दूँगा।’’
‘‘क्यों? सुन्दरलाल ने पूछा।
‘‘इसलिए कि यह तुम्हारी पत्नी नहीं रखैल है। तुम्हारे धन के लिए तुम्हारे पीछे लगी हुई है। अन्यथा जब तुमने इसके साथ विवाह करने से न की थी, तो इसको तुम्हारे साथ सम्बन्ध नहीं बनाना चाहिए था।’’
सुन्दरलाल ने पूछा, ‘‘पिताजी ! विवाह क्या होता है?’’
‘‘जिसमें किसी को साक्षी बना लिया जाये। इसीलिए मजिस्ट्रेट के सामने वचन को भी विवाह ही कहा जायेगा।’’
‘‘साक्षी की क्या आवश्यकता है?’’ सुन्दरलाल का अगला प्रश्न था।
‘‘साक्षी की आवश्यकता इस कारण होती है कि किसी समय पुरुष अथवा स्त्री बईमान हो जायें, तो उनको विवश किया जा सके कि वे अपने उत्तरदायित्व का पालन करें।’’
‘‘इसके लिए मैंने एक बहुत बड़ा साक्षी बना लिया है। वह केवल साक्षी ही नहीं, प्रत्युत जामिन (बन्धक) भी है। वह है रुपया। मैंने इसको इतना रुपया दे दिया है कि यदि किसी समय मैं बेईमान भी हो जाऊँ, तब भी इसको, जो कुछ मुझसे झगड़ा कर प्राप्त हो सकता है, वह पहले ही प्राप्त हो जाये। न झगड़े की आवश्यकता रही है और न ही किसी साक्षी की।’’
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