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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
सूसन ने शेक-हैण्ड करने के स्थान झुककर चरण-स्पर्श करने का यत्न किया। उसने हिन्दुस्तान में, पुराने विचार के लोगों का आदर करने का यह ढँग शकुन्तला से जान रखा था।
‘‘बस ! बस !!’’ सेठ कुन्दनलाल ने कहा, ‘‘हो गया। इतना ही काफी है।’’ सुन्दरलाल की माँ हँस पड़ी। उसने कहा, ‘‘देखो, मैंने कहा था न कि असल नकल से अधिक मजेदार होता है।’’
सूसन अपनी जगह पर बैठी तो सुन्दरलाल ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘पिताजी ! अब तो आपको एक दावत अपनी नई बहू को देनी चाहिए।’’
‘‘अपनी जगह पर बैठो। देखो, सब लोग हमारी ओर ही देख रहे हैं। आये तो तमाशा देखने और स्वयं तमाशा बन रहे हो।’’
सुन्दरलाल की माँ ने पूछा, ‘‘तुमने मुझको पहिले क्यों नहीं बताया?’’
‘‘बताया तो था कि मैं आपके लड़के को जानती हूँ।’’
‘‘मैं भी विचार कर रही थी कि तुम्हारे साथ मेरे लड़के का क्या सम्बन्ध हो सकता है !’’
इसपर सेठ ने कहा, ‘‘देखो सुन्दर ! आज पिक्चर देखने के पश्चात् किसी अच्छे से होटल में ले चलना। खाना वहीं खायेंगे।’’
‘‘तो निमन्त्रण आपकी ओर से हैं?’’
‘‘हाँ, पर प्रबन्ध तुम्हारा होगा।’’
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