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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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जब शकुन्तला और ललिता सूसन से मिलने के लिए मैरीन ड्राइव वाले रैस्टोराँ मे आईं, तो सूसन वहाँ उनकी प्रतीक्षा पहले से ही कर रही थी। वह गम्भीर विचार में मग्न एक कोने में रखी मेज पर बाँहें टेके बैठी थी। शकुन्तला उसके सामने आकर खड़ी हो गई, तब उसका ध्यान भंग नहीं हुआ। ललिता उसके पास कुर्सी पर बैठ उसके गले में बाँह डालकर बोली, ‘‘सूसन बहिन ! रुष्ट हो गई हो?’’ ललिता का विचार था कि रामचन्द्र के कठोर वचनों ने उसको दुखी किया है।
सूसन को चेतना हुई तो उसने मुस्कराते हुए शकुन्तला से कहा, ‘‘आओ, बैठो न।’’
शकुन्तला बैठी तो सूसन ने चाय का आर्डर दे दिया। पश्चात् उसने कहा, ‘‘मैं आज प्रातःकाल तुमको इस कारण मिलने गई थी कि मिस्टर भगेरिया के पिताजी से कल भेंट हुई थी और तुम्हारे विषय में भी बातचीत हुई है।’’ इतना कह सूसन ने वह सब बातचीत, तो सेसिल होटल में सेठ कुन्दनलाल से हुई थी, सुना दी।
पूर्ण बात सुनकर उसने कहा, ‘‘कल रात मैं इस वार्त्तालाप से उत्पन्न विचारों के कारण सो नहीं सकी। मुझको अपने इस विवाहित जीवन पर अविश्वास-सा उत्पन्न हो रही है। मैं इसके परिणामों पर विचार करती हूँ तो अपने किये पर पश्चात्ताप करने लगती हूँ।’’
‘‘देखो बहिन सूसन !’’ शकुन्तला ने कहा, ‘‘जो कुछ होना था, सो तो हो गया है। अब तो इससे और अधिक सुख प्राप्ति का यत्न करना चाहिए। चिन्ता की कोई विशेष बात नहीं है। आपके पास जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त धन है भगेरिया साहब में आपके लिए अरुचि उत्पन्न होने पर, आप इस प्रकार निःसहाय नहीं रह सकतीं, जितना मैं अनुभव करती हूँ। इसपर भी, मैं यह समझती हूँ कि यदि मेरे भाग्य में भूखों मरना है, तो कुबेर का धनकोश भी मेरा पेट नहीं भर सकेगा। परन्तु तुमने तो अपनी बुद्धि से, अपने उलटे दिनों के लिए प्रबन्ध कर लिया है। तुमको चिन्ता करने की आवश्यकता नहीँ।
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