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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘देखो बहिन ! मुझको अपनी तो चिन्ता नहीं। मैं तो किसी होने वाले के लिए चिन्तित थी। वह लड़का होगा अथवा लड़की, कहना कठिन है। जो कुछ भी हो, उसका पालन-पोषण करके उसको संसार में मानयुक्त जीवन के योग्य बनाना भी तो काम है।

‘‘चिन्ता की बात यह है कि पिता-पुत्र भगेरिया क्या और आपके पिता और भाई क्या, ये सब धनी आदमी विचित्र प्रकार से विचार करते हैं। यह कहना कठिन है कि किसी समय भी ये क्या सोचें और क्या कुछ न कर दें।’’

‘‘मैं स्वयं भी परेशान हूँ। यद्यपि राम का मैंने कुछ नहीं बिगाड़ा तो भी उसकी आँखें बदलती देख, मुझको भी अपने जीवन पर पुनः अवलोकन करने की आवश्यकता पड़ गई है। मैं अपने पिता के घर अपना शेष जीवन बिताने आई हूँ और अब यह अनुभव कर रही हूँ कि यह हो नहीं सकेगा।

‘‘परन्तु सूसन बहिन ! क्या कोई नया जीव आने वाला है, जो इस प्रकार की चिन्ता करने लगी हो?’’

सूसन ने आँखें नीची कर कहा, ‘‘दो-तीन सप्ताह से मैं कुछ ऐसा ही अनुभव कर रही हूँ। आज तो, आपके यहाँ से आने के पश्चात् उल्टी हो गई। हमारी नौकरानी सन्तोषी कहने लगी कि मेरे पेट में बच्चा है। उसके कहने के पश्चात् तो मुझको सत्य ही पेट में कुछ घूमता हुआ प्रतीत होने लगा।’’

‘‘तो यह बात है?’’ ललिता ने मुस्कराते हुए कहा, ‘‘चिन्ता क्यों है? जब कोई नई बात होगी, तो उस समय विचार कर ली जायेगी। विचारणीय बात तो इस समय की है। जीजाजी ने अभी तक तो कोई ऐसी बात नहीं की, जो चिन्ता का कारण हो सके?’’

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