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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


बिहारीलाल इण्टमीडिएट की परीक्षा देकर देवगढ़ आया, तो उसको वहाँ की रूपरेखा ही बदली हुई प्रतीत हुई। अब तो चौधरी, जो फकीरचन्द के गाँव में आने के समय कर्ज के नीचे दबा हुआ था, जिसके मकान और खेत कुर्क होने वाले थे, इन चार वर्षों में अपना नया मकान बनाकर रहने लगा था। माधो ने थोक की दुकान ललितपुर में और एक बीना में खोल ली थी। शेषराम इत्यादि काम करने वालों की अवस्था भी बहुत सुधर चुकी थी। शेषराम का विवाह हो चुका था। गिरधारीलाल के घर एक और बच्चा हो चुका था और उसकी पत्नी मीना अब कपड़ा बुनने के कारखाने में काम सीख रही थी। उसको काम सीखते हुए भी वहाँ से पाँच-छः आने नित्य मिल जाते थे।

फकीरचन्द ने डिस्ट्रिक बोर्ड को लिखकर देवगढ़ से जिरौन स्टेशन तक पक्की सड़क बनवा ली थी। गाँव के बीसियों आदिमयों ने बैलगाड़ियाँ बनवा ली थीं और कइयों ने ताँगे-घोड़े भी रख लिए थे।

गाँव में चहल-पहल थी। जब बाहर से रुपया आने लगा तो नये-नये दुकानदार भी पैदा हो गये। अब प्रत्येक प्रकार का सामान गाँव के बाजार में बिकने लगा था।

इस समय मोतीराम और उसके साथ एक सर्यकान्त नाम का व्यक्ति गाँव में आ गये। इन्होंने गाँव में एक मकान भाड़े पर ले लिया और उसमें रहने लगे। फकीरचन्द को तो पहले दिन ही चौधरी ने आकर बताया कि मोतीराम आया है। इसपर भी फकीरचन्द ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। चौधरी इतनी सुगमता से चुप रहने वाला नहीं था। उसने गाँव के एक-दो आदमियों को मीतीराम के साथ लगा दिया। वह अब तक समझ गया था कि मोतीराम जैसा आदमी केवल रहने के लिए ही गाँव में आया होगा, असम्भव है। इसमें से किसी विशेष कारण की सम्भावना थी।

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