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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
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फकीरचन्द को मुकद्दमे से निपटने में तीन महीने लग गये। इस अवधि में वह अपने काम की ओर ध्यान नहीं दे सका। इसपर भी आय खूब हुई। जंगल की लकड़ी की आय कुछ कम हो हई थी, परन्तु खेती-बाड़ी की आय बढ़ गई। गन्ने की बिक्री तो नहीं हुई, परन्तु गुड़ बनाकर बेचने से तो आय और भी अधिक हुई। इस वर्ष उसने गेहूँ के अतिरिक्त मूँग और अरहर की खेती भी की।
सब मिल-मिलाकर तैंतालीस हजार की आय हुई और तेरह हजार रुपया दान-दक्षिणा में व्यय हो गया।
खेती-बाड़ी के काम के अतिरिक्त इस वर्ष कपड़ा बुनने और रंगाई का काम भी किया जाने लगा। फकीरचन्द ने एक पौल्ट्री फार्म भी खोल लिया था। मुर्गी पालने के विषय में एक जानकार आदमी नौकर रख लिया गया और उसकी देख-रेख में मुर्गियों और अण्डों का व्यापार किया जाने लगा। इसी प्रकार कपड़ा बुनने का एक जानकार बाहर से बुलाया गया और गाँव के, विशेष रूप से वे लोग, जो खेतों में काम कर बहुत-सा समय खाली रहते थे, इस काम में लगा दिए गए। मशीनी सूत पर बुनाई सिखाई जाती थी और कपड़ा बुना जाने पर पारिश्रमिक दिया जाता था।
कपड़ा बुनने के काम से इतनी आय नहीं हुई, जितनी पौल्ट्री फार्म से हुई थी। इस वर्ष तो कपड़े के काम में कम लोगों ने रुचि ली, कारण यह कि लोग काम करना जानते नहीं थे। परन्तु फकीरचन्द को आशा थी कि इस काम को सीखने पर, लोग अधिक रुचि लेने लगेंगे।
जबसे करोड़ीमल और फकीरचन्द में झगड़ा हुआ था, तबसे ही मोतीराम ने सेठ का काम करना छोड़ दिया था। मोतीराम भागा हुआ था और लक्ष्मीधर भी काम छोड़ गया था। इसपर सेठ के किते में काम बन्द पड़ा था।
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