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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
‘‘तो यह वेतन कम है क्या?’’
‘‘सूर्य बाबू कहता है कि कम है।’’
‘‘उसके पास कौन-सा पैमाना है, जिससे उसने नापकर कहा है कि कम है?’’
‘‘देखो मीना ! वह एक पढ़ा-लिखा आदमी है। इससे उसने ठीक ही तो कहा होगा। आखिर फकीरचन्द भी तो हमारे जैसा आदमी है। उसको हजारों रुपए की आय होती है और मुझको केवल पचास रुपये की।’’
‘‘पर देखो न, बृज भी बाबू के खेतों में काम करता है। उसको केवल बीस रुपये महीना ही तो वेतन मिलता है। क्यों? उसको भी आपकी भाँति पचास रुपये क्यों नहीं मिलते?’’
‘‘इसलिए कि मैं बृज से अधिक काम जानता हूँ।’’
‘‘तो क्या तुम यह नहीं समझ सकते कि बाबू फकीरचन्द तुम्हारे से अधिक काम जानता है और इस कारण ही उसको रुपया अधिक मिलता है?’’
‘‘इसपर भी मेरे और बृज के वेतन में अन्तर इतना अधिक नहीं जितना मेरी और फकीरचन्द की आय में है।’’
‘‘वह भी तो स्पष्ट ही है। तुम्हारे में और बाबू फकीरचन्द में अन्तर भी बहुत अधिक है।’’
‘‘मुझको तो प्रतीत नहीं होता।’’
‘‘बम्बई में और उससे पहले गाँव में तुम्हारी क्या हालत थी और फकीरचन्द, जब यहाँ आया था तो तुम जैसा ही था, परन्तु उसने यहाँ स्वर्ग-निर्माण कर लिया है जो तुम नहीं कर सके।’’
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