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उपन्यास >> धरती और धन

धरती और धन

गुरुदत्त

प्रकाशक : सरल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :195
मुखपृष्ठ : Ebook
पुस्तक क्रमांक : 7640

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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती।  इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।


‘‘सूर्यकान्त कहता था कि वह चार है, इसलिए उसने इतनी उन्नति कर ली है।’’

‘‘वह मोतीराम का मित्र है। मोतीराम पक्का चोर है और यह बात स्वयं सिद्ध है कि चोरों को सब चोर ही दिखाई देते हैं।’’

‘‘तो तुम इस यूनियन की मैम्बर नहीं बनोगी?’’

‘‘तुम बन जाओ। पर यह याद रखना कि यदि किसी कारण तुम्हारा काम बिगड़ा, तो मेरे पन्द्रह रुपये में घर का निर्वाह नहीं हो सकेगा। तुमको फिर बम्बई जाना पड़ेगा।’’

बम्बई जाने की धमकी सुन गिरधारी गम्भीर विचार में पड़ गया। अगले दिन वह शेषराम से मिला और उससे यूनियन का मेम्बर बनने को कहने लगा। शेषराम ने कहा, ‘‘गिरधारी भैया ! सूर्यकान्त मेरे पास भी आया था और मुझको बहुत बातें कह गया है। मैं तो उसका बातें समझ नहीं सका। वह मोतीराम का मित्र है। दोनों इकट्ठे रहते हैं। इससे तो मुझको सन्देह है कि वह और सूर्यकान्त, दोनों सेठ करोड़ीमल की ओर से भेजे गये हैं और उनका उद्देश्य केवल मात्र फकीरचन्द को हानि पहुँचाना है।

‘‘हमारी बातचीत में मोतीराम ने कभी भी हस्तक्षेप नहीं किया। इससे उनका परस्पर क्या सम्बन्ध हो सकता है, इसमें कुछ कहने का, मुझे अधिकार नहीं।’’

‘‘शेषराम !’’ गिराधारी ने कहा, ‘‘एक बार मेरे सामने सूर्यकान्त से मिल लो। मैं समझता हूँ कि बात समझ में आ जाएगी।’’

‘‘भैया ! मैं मिल चुका हूँ। मुझको तो दाल में कुछ काला प्रतीत होता है।’’

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