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उपन्यास >> धरती और धन धरती और धनगुरुदत्त
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बिना परिश्रम धरती स्वयमेव धन उत्पन्न नहीं करती। इसी प्रकार बिना धरती (साधन) के परिश्रम मात्र धन उत्पन्न नहीं करता।
गिरधारी शेषराम से निराश हो, दूसरे कर्मचारियों में बातचीत करने लगा।
सूर्यकान्त की गतिविधि का ज्ञान फकीरचन्द को हो रहा था। इससे वह परेशानी अनुभव करने लगा था। इस विषय में बिहारीलाल और फकीरचन्द में बातचीत हुई तो बिहारी इस चाल को समझ इसका प्रबन्ध करने का विचार कर रहा था।
जब से वह देवगढ़ में आया था, फकीरचन्द के काम में वह सहयोग दे रहा था। सूर्यकान्त की समस्या उग्र होती देख, उसने भी अपनी एक योजना बना ली। उसने घूम-घूमकर अपने मजदूरों में से कुछ समझदार मजदूरों को एक संगठन में बाँध लिया। लगभग बीस ऐसे मजदूर मिल गए। उसी दिन उसने फकीरचन्द से राय कर, अपने गुट के मजदूरों में से एक को बुलाकर, उसको बीस आने देकर कहा कि वह उस रात सूर्यकान्त की बैठक पर जाये और उनकी यूनियन का सदस्य बन जाये।
इस प्रकार-एक-एक, दो-दो कर, उसने अपने गुट के सारे के सारे सदस्यों को सूर्यकान्त की यूनियन का सदस्य बना दिया। इस गुट में शेषराम भी था। शेषराम को देखकर गिरधारी को बहुत प्रसन्नता हुई, परन्तु सू्र्यकान्त को सन्देह हो गया। सूर्यकान्त ने शेषराम का चन्दा लेते हुए कहा, ‘‘शेषराम, भैया ! तुमने तो गिरधारी को कहा था कि तुमको फकीरचन्द के विरुद्घ कोई शिकायत नहीं है? अब तुम कैसे आ गए हो?’’
‘‘बाबू ! मुझको तो बृज ने बताया है कि आपकी यह कमेटी मजदूरों की भलाई के लिए बनाई जा रही है। यह किसी खास मालिक के विरुद्ध नहीं है। इस बात को समझकर ही मैं यहाँ आ गया हूँ।’’
इस बात को सुन सूर्यकांत शेषराम को लेने पर विवश हो गया।
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